56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाति व्यवस्था का आधिश्रेणित चरित्र भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जातियां एक ऐसी क्रमिक व्यवस्था है, जहां एक जाति सबसे ऊपर है और सर्वोच्च है, तो दूसरी जाति सबसे नीचे है, और इन दोनों के बीच अनेक जातियां हैं, जो किसी के ऊपर हैं और किसी के नीचे हैं। जाति व्यवस्था श्रेणियों की एक व्यवस्था है, जिसमें सबसे श्रेष्ठ और सबसे नीच जाति को छोड़कर प्रत्येक जाति की दूसरी कुछ जातियों पर प्रधानता बनी हुई है।
इस प्रधानता अथवा श्रेष्ठता को कैसे निर्धारित किया जाता है? यह श्रेष्ठता और हीनता अथवा कनिष्ठता की व्यवस्था उन नियमों के आधार पर निर्धारित की जाती है, जिसका (1) धार्मिक संस्कारों के साथ, और (2) अनुरूपता के साथ संबंध है।
धर्म, प्रधानता के नियमों के आधार पर स्वयं को तीन प्रकार से प्रकट करता है। प्रथम, धार्मिक समारोह द्वारा। दूसरा, धार्मिक संस्कार में पढ़े जाने वाले मंत्रों द्वारा, तीसरा, पुरोहित के द्वारा।
हम, समारोह को प्रधानता के निमयों के स्रोत मानकर आरंभ करते हैं। यहां हमारे लिए यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में सोलह धार्मिक संस्कारों को निर्देशित किया गया है। यद्यपि, यह सब हिंदू धार्मिक संस्कार हैं, फिर भी प्रत्येक हिंदू जाति इन सभी सोलह संस्कारों पर अपना अधिकार नहीं जता सकती। कुछ के कुछ विशेष संस्कार करने की अनुमति है, तो कुछ जातियों को इन संस्कारों को करने की अनुमति नहीं है। उदाहरण के लिए हम पवित्र जनेऊ पहनने के उपनयन संस्कार को ही लेते हैं। कुछ जातियां जनेऊ नहीं पहन सकतीं। इस संस्कार को कराने के अधिकार के लिए भेदभाव होता है। जिन जातियों को सभी संस्कारों को करने का अधिकार है, उन जातियों का स्थान समाज में उन लोगों से निश्चित ही श्रेष्ठ होता है, जिन्हें केवल कुछ ही संस्कार करने का अधिकार है।
अब हम मंत्रों को देखें। श्रेष्ठता के नियमों का यह दूसरा स्रोत है। हिंदू धर्म के अनुसार, एक ही संस्कार को दो प्रकार से मनाया जा सकता है - (1) वेदोक्त, और (2) पुराणोक्त। वेदोक्त पद्धति में संस्कार, वेदों के मंत्रों के उच्चारण के साथ किए जाते हैं। पुराणोक्त पद्धति में इन संस्कारों को पुराणों के मंत्रों से किया जाता है। हिंदू धर्म-शास्त्र की दो भिन्न-भिन्न श्रेणियां हैं - (1) वेद, जो चार है, और (2) पुराण, जो अठारह हैं। यद्यपि उनका धर्म-शास्त्रों के रूप में आदर किया जाता है, फिर भी उन सबको समान मान्यता प्राप्त नहीं है। वेदों की सर्वश्रेष्ठ मान्यता है, तो पुराणों की सबसे निम्न स्तर की मान्यता है। इन मंत्रों के कारण सामाजिक प्रधानता किस प्रकार से निर्मित होती है, यह इस बात को ध्यान में रखने पर स्पष्ट हो उठती है कि प्रत्येक जाति को वेदोक्त पद्धति से समारोह करने का अधिकार नहीं है। केवल तीन ही जातियां इन सोलह