हिंदुत्व का दर्शन
57
संस्कारों में से एक पर अपना अधिकार जता सकती हैं। परंतु, उनमें भी एक जाति को उसे वेदोक्त पद्धति से करने का अधिकार है, तो अन्य को पुराणोक्त पद्धति से। एक धार्मिक क्रिया को संपन्न करने के लिए जिस प्रकार के मंत्र-पाठ की अनुमति होती है, जाति की श्रेष्ठता का निर्धारण भी उसी तरह किया जाता है। जिस जाति को वेदोक्त मंत्रों का प्रयोग करने का अधिकार है, निश्चय ही वह जाति उस जाति से श्रेष्ठ मानी जाती है, जिसे पुराणोक्त मंत्रों का प्रयोग करने का अधिकार है।
धर्म से संबंधित प्राथमिकता का दूसरा स्रोत है पुरोहित। हिंदू धर्म में धार्मिक समारोह से पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए पुरोहित की आवश्यकता होती है। धर्म शास्त्रों द्वारा नियुक्त पुरोहित ब्राह्मण है। इसलिए ब्राह्मण का परित्याग नहीं किया जा सकता। परंतु धर्म-शास्त्र यह बात नहीं बताते कि ब्राह्मण द्वारा किसी भी और प्रत्येक हिंदू के बिना उसकी जाति पूछे धार्मिक संस्कार करने के किस निमंत्रण को स्वीकार किया जाए और किस नहीं। यह बात ब्राह्मण की इच्छा पर छोड़ दी गई है। दीर्घकालीन तथा सुस्थापित प्रथाओं द्वारा अब यह बात निश्चित हो गई है कि किन जातियों के समारोह वह मनाएगा और किनके नहीं। यह वस्तु-स्थिति दो जातियों के बीच में श्रेष्ठता का आधार बन गई है। जिस जाति के संस्कार में ब्राह्मण उपस्थित रहता है, वह जाति उस जाति से श्रेष्ठ मानी जाती है, जिनके धार्मिक संस्कार में ब्राह्मण उपस्थित नहीं रहता।
श्रेष्ठता के नियमों का दूसरा स्रोत, सहभोज है। यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि जिस तरह से सहभोज के नियमों ने प्रधानता के नियमों का निर्माण किया, वैसा विवाह के बारे में नहीं हुआ। इसका कारण अंतर्ताजीय विवाह तथा अंतर्जातीय भोज के प्रतिबंध के नियमों में निहित है। अंतर्जातीय विवाह पर लगे प्रतिबंध को तो एक बार किसी सीमा तक स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन अंतर्जातीय भोज पर लगा प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं। उसका पालन नहीं किया जा सकता। कारण यह है कि मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है। यह जरूरी नहीं कि उसे हर बार नई जगह पर उसकी अपनी जाति के लोग ही मिलें। तब ऐसी स्थिति में वह अपरिचित लोगों के साथ होता है। विवाह के लिए तो वह अपनी जाति में लौटने तक का इंतजार कर सकता है, लेकिन भोजन तो उसे प्रतिदिन चाहिए। उसके लिए तो किसी न किसी से उसे भोजन लेना ही पड़ेगा। नियम यह है कि वह अपने से ऊंची जाति से ही अन्न या भोजन ले सकता है, निम्न जाति से नहीं। यह बात विशेष रूप से ब्राह्मणों द्वारा अनुपालित नियमों के द्वारा निश्चित की जाती है। इसी संदर्भ में भोजन और पानी के लिए व्यापक निर्धारित नियम हैं। (1) वह कुछ लोगों से केवल पानी ले सकता है और दूसरों से नहीं। (2) ब्राह्मण किसी भी अन्य जाति के पानी में पकाए खाने को स्वीकार नहीं करेगा, और