1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(3) वह कुछ जाति के लोगों से तेल में पका हुआ खाना स्वीकार कर सकता है। जिस बर्तन में अन्न तथा पानी लिया जाए, उसके लिए भी अलग नियम है। कुछ जाति के लोगों से वह मिट्टी के बर्तन में भोजन अथवा पानी ले सकता है। इसी तरह से कुछ जातियों से केवल धातु के बर्तन में और कुछ से केवल कांच के बर्तन में। इस आधार पर जाति का स्तर निश्चित होता है। यदि वह तेल में पका भोजन किसी जाति से लेता है, तब उस जाति का स्तर, जिस जाति से वह खाना स्वीकार नहीं करता है, ऊंचा हुआ। यही बात पानी के बारे में भी है यदि वह धातु के बर्तन में पानी लेता है तब उसका स्थान उससे ऊंचा है, जिसका पानी वह मिट्टी के बर्तन में लेता है और यह दोनों जातियां उस जाति से ऊंची हैं, जिससे वह कांच के बर्तन में पानी लेता है। कांच ऐसा पदार्थ है जिस पर दाग नहीं लगता। इसलिए ब्राह्मण उससे सबसे निम्न जाति के व्यक्ति से भी पानी ले सकता है लेकिन दूसरे धातु के बर्तन में दाग लग सकता है, अतः अन्य धातु के बर्तन में पानी ले या न ले, यह ब्राह्मण पर निर्भर करता है।

यही कुछ मुद्दे हैं, जो हिंदुओं की जाति-श्रेष्ठता की व्यवस्था में किसी जाति का स्थान और स्तर निश्चित करते हैं।

जाति-व्यवस्था की यह क्रमिक बनावट एक विशेष तरह की सामाजिक मानसिकता बनने और बनाने के लिए जिम्मेदार है, जिस पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए। प्रथम, इसके कारण विभिन्न जातियों में प्रतिष्ठा के लिए प्रतिस्पर्धी की भावना निर्मित होती है। दूसरा, विभिन्न जातियों के बीच एक दूसरे के लिए द्वेष और घृणा की भावना पनपती है।

इस द्वेष तथा घृणा की भावना ने केवल कहावतों में ही स्थान प्राप्त नहीं किया, बल्कि उसे हिंदू साहित्य में भी स्थान मिला है। मैं यहां, सहयादि खंड नाम के धर्म-शास्त्र का संदर्भ दे रहा हूं जो अनेक पुराणों में से एक है। यह पुराण भी हिदुंओं के पवित्र-ग्रंथों का ही एक भाग है लेकिन इसका विषय अन्य पुराणों से बिल्कुल अलग है। इसमें विभिन्न जातियों की मूल उत्पत्ति के बारे में बतलाया गया है। ऐसा करते हुए, उसमें अन्य जातियों को कुलीन उत्पत्ति का बताया गया है, जब कि ब्राह्मण को सबसे घृणित उत्पत्ति का बताया गया है। यह सब मनु से प्रतिशोध की प्रतिक्रिय स्वरूप किया गया। एक प्रकार से यह ब्राह्मण जाति पर लगाया गया बहुत ही बुरा लांछन है। स्वभाविक था कि पेशवाओं ने उसे नष्ट करने की आज्ञा दी थी। परंतु इस पुराण की कुछ प्रतियां नष्ट होने से बच गईं।

लेकिन कुछ प्रश्न करने से पहले मैं यहां एक बात का और उल्लेख करता हूं।

संभवतः वर्तमान हिंदू मार्क्सवाद के घोर विरोधी हैं। इसके पीछे कारण यह है कि मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत से वे बहुत ही भयभीत हो जाते हैं। लेकिन वहीं लोग यह भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग-संघर्ष, बल्कि वर्ग-युद्ध की भूमि बन चुका है।