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हिंदुत्व का दर्शन

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सबसे दुखदायी वर्ग-युद्ध ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच हुआ था। हिन्दुओं का श्रेष्ठ साहित्य इन दो वर्णों के बीच हुए संघर्षों से भरा पड़ा है।

पहला ज्ञात संघर्ष ब्राह्मण और राजा वेण के बीच हुआ था। वेण राजा अंग का पुत्र था, जो अत्रि वंश का था। उसकी मां सुनीता, मृत्यु की बेटी थी। काल (मृत्यु) की पुत्री के इस पुत्र पर अपने मातृक दादा नाना के कलंक के कारण वह अपने राजा के कर्तव्यों का त्याग करके विषय-वासना में जीवन व्यतीत कर रहा था। इस राजा ने वेदों की आज्ञाओं का उल्लंघन करते हुए अपनी गैर-धार्मिक व्यवस्था की स्थापना की थी। उसके राज्य में लोग धर्मशास्त्रों को अध्ययन नहीं करते थे और देवों को यज्ञ के समय सोमरस की आहुति नहीं दी जाती थी। उसने स्पष्ट घोषित किया था -

‘मैं ही यज्ञ का उद्देश्य हूं, यज्ञकर्ता भी और स्वयं यज्ञ हूं। मेरे लिए ही यज्ञ किया

जाए और आहुति दी जाए।’

बाद में मारिची ऋषि के नेतृत्व में ऋषियों ने उसे निम्न प्रकार से संबोधित किया-

‘हम एक ऐसा समारोह मनाने जा रहे हैं, जो अनेक वर्षों तक चलेगा। हे वेण, अनाचार का पालन न करो। यह तुम्हारा शाश्वत् कर्तव्य नहीं है। तुम प्रत्येक लक्षण से अत्रि के वंश के प्रजापति हो और तुन्हें अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए।’

उस मूर्ख वेण ने, जो सदाचार नहीं जानता था, इन महान ऋषियों की हंसी उड़ाते हुए उन्हें उत्तर दिया, ‘मेरे अलावा कर्तव्य की आज्ञा देने वाला और कौन हो सकता है। मुझे किसकी आज्ञा का पालन करना है? इस पृथ्वी पर पवित्र ज्ञान, सामर्थ्या, तपस्या और सत्य में मेरे बराबर कौन हो सकता है? जो लोग झूठे तथा मूर्ख हैं, वे नहीं जानते कि मैं ही सभी मनुष्यों का स्रोत हूं। इस कथन का विश्वास करने में कोई झिझक नहीं। यदि मैं चाहूं तो सारी पृथ्वी को जलाकर राख कर सकता हूं। उस पर मूसलाधार वर्षा ला सकता हूं, अथवा स्वर्ग और पृथ्वी को बंदी बना सकता हूं।’

अंत में उसकी अज्ञानता और मूर्खता के कारण जब वेण पर उनका कोई अधिकार नहीं चल सका, तब वे शक्तिशाली ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने इस बलवान तथा झगड़ालू राजा को पकड़ लिया और उसकी बाई जांघ को घिसने के बाद एक काला मनुष्य पैदा हुआ जो कद का छोटा था और भयभीत होने के कारण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसे उत्तेजित देखकर अत्रि ने कहा, ‘बैठ जाओ निषाद’। वह बाद में निषाद वंश का संस्थापक बना। वह धीवर (मछेरे) लोगों का भी जन्मदाता है, जो वेण के भ्रष्ट आचरण से उत्पन्न हुए। इसी प्रकार विंध्याचल निवासी तुरवार तथा तुम्बुरा, दोनों उसके इसी प्रकार के आचरण से उत्पन्न हुए, जो अत्यंत उच्छृंखल थे।