1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 75

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बाद में उन्हीं शक्तिशाली ऋषियों ने क्रोधित और उत्तेजित होकर पुनः वेण के दाएं हाथ को घिसा, जैसे लोग अरनी की लकड़ी घिसते हैं, और उससे अग्नि के समान तेजस्वी शरीर वाला प्रिथ उत्पन्न हुआ।

इस वेण के पुत्र (प्रिंथ) ने बाद में हाथ जोड़कर उन महान ऋषियों को संबोधित कियाµ

‘प्रकृति ने मुझे समझने की बहुत कमजोर शक्ति दी है। मुझे बताओ, मैं अपने कर्तव्यों को कैसे समझूं? मुझे सही तरह से बताएं कि मैं उनका उपयोग कैसे करूं? मैरे ऊपर संदेह न करो। मेरे कर्तव्यों और उद्देश्यों के बारे में आप जो कुछ भी कहेंगे, मैं पालन करूंगा।’

तब उन देवताओं तथा महान ऋषियों ने उनसे कहा µ

‘कोई भी कर्तव्य तुम्हें बताया जाए, उसका यह ध्यान किए बिना कि वह तुम्हें पसंद है अथवा नहीं, सभी प्राणी मात्र को समान दृष्टि से देखते हुए, क्रोध, लालसा तथा अहंकार, इन तीनों लालसाओं को दूर रहकर बिना झिझक पालन करो। अपनी सामर्थ्य से उन लोगों के शास्त्रों पर रोक लगाओ जो सदाचार से हट जाते हैं। अपने कर्तव्य के प्रति निरंतर श्रद्धा रखो और मन, वचन, कर्म से तुम पृथ्वी पर वेद या ब्राह्मणों की रक्षा करोगे, और वचन दो कि तुम ब्राह्मणों को दंड नहीं दोगे’ तब वेण के पुत्र ने उनकी बात मन से स्वीकार की। परिणामस्वरूप सभी ऋषि उससे प्रसन्न हुए। ज्ञानी मुनि शुक्र उसके पुरोहित बने। बालखिल्प और सारस्वत उसके मंत्री और गर्ग ऋषि उसके ज्योतिषि बने।

दूसरा संघर्ष ब्राह्मण और क्षत्रिय राजा पुरुरवा के बीच हुआ। उसका संक्षिप्त संदर्भ महाभारत के आदि पर्व से प्राप्त होता है।

पुरुरवा का जन्म इला से हुआ था। उसका समुद्र के तेरह द्वीपों पर साम्राज्य था और ऐसे व्यक्ति उसके साथी थे, जो सभी श्रेष्ठ मानव थे। वह स्वयं भी एक महान और कीर्तिवान पुरुष था। अपनी सामर्थ्य के नशे में चूर होकर पुरुरवा ने ब्राह्मणों के साथ युद्ध करके उनके सभी अधिकार छीन लिए थे। यहां तक कि ब्राह्मण के स्वर्ग से प्रकट हुए सनत कुमार की चेतावनी को भी उसने नहीं माना। इस पर क्रोधित होकर ऋषियों ने उसे शाप दे दिया। इस तरह से वह लोभी सम्राट अपनी शक्ति के अहंकार के कारण नष्ट हो गया।

तीसरे टकराव की घटना ब्राह्मणों और राजा नहुष के बीच में घटी। यह कहानी महाभारत के उद्योग पर्व में विस्तार से दी गई है यह इस प्रकार से हैः

राक्षक वृत्र की हत्या करने के बाद इंद्र एक ब्राह्मण की हत्या से घबरा गया (क्योंकि वृत्र को ब्राह्मण माना जाता था), और उसने अपने-आपको पानी में छुपा