1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जिसने इंद्राणी का स्वागत किया। उसने अपना प्रस्ताव रखा। उसने कहा - ‘हे देवताओं के राजा, मेरी कामना है कि आप ऐसे वाहन पर सवार होकर आएं जैसा विष्णु, रुद्र और राक्षसों के पास भी न हो, और प्रख्यात ऋषि उसके सारथी हों।’

नहुष ने इस प्रार्थना का अनुमोदन किया और स्वयं अपने मुंह से अपनी ही प्रशंसा करते हुए कहाः ‘जो मुनियों को अपना सारथी बनाए, वह किसी अल्प शक्ति का पुरुष नहीं हो सकता। मैं शक्ति का कठोर उपासक हूं। मैं भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्य का स्वामी हूं और प्रत्येक बात मुझ पर निर्भर होती है। इसलिए हे देवी, तुम्हारे प्रस्ताव का मैं बिना संकोच पालन करूंगा। सात ऋषि तथा सभी ब्राह्मण मुनि मेरे रथ के सारथी होंगे। हे सुंदर देवी, अब तू मेरी शक्ति और चमत्कार देख।’ इसी प्रकार यह कहानी आगे बढ़ती हैः इसी के अनुसार, उस अहंकारी, क्रूर, धर्मद्रोही, दुष्ट तथा दुराचारी पुरुष ने सभी ऋषियों को अपने रथ से बांध दिया। ऋषियों ने उसकी आज्ञा का पालन किया। इस प्रकार उसने उन्हें रथ खींचने के लिए बाध्य किया। इंद्राणी फिर बृहस्पति के पास गई, जिसने उसे आवश्वासन दिया। किस तरह वह स्वयं उत्पीड़नकर्ता के विनाश के लिए यज्ञ करेगा और इंद्र का अदृश्य स्थान खोज निकलेगा। फिर अग्नि को इंद्र की

खोज करने और बृहस्पति के पास लाने के लिए भेजा गया। इंद्र के आगमन पर बृहस्पति ने उसकी अनुपस्थिति में जो कुछ भी वहां हुआ, वे सारी बातें कह डालीं। जब इंद्र, कुबेर, यम, सोम तथा वरुण के साथ नुहष का विनाश करने की योजना बना रहे थे, तब अगस्त्य मुनि वहां आए और उन्होंने इंद्र को उसके प्रतिस्पर्धी की हार पर बधाई दी। घटना कैसे घटी, उसकी कहानी इस तरह से बताई हैः ‘उस पापी नहुष का रथ

खींचते-खींचते ब्राह्मण ऋषियों ने महापुरुष नहुष से एक समस्या का समाधान करने को कहा और पूछा - ‘हे महापराक्रमी कीर्तिवान राजा, जिन ब्राह्मण मंत्रों का पाठ राजा को बलि देते समय किया जाता है, उन्हें आप अधिकृत मानते हैं या नहीं?’

नहुष ने, जिसकी बुद्धि अंधकार से घिरी हुई थी, उत्तर दियाः ‘‘नहीं’ ऋषियों ने एक साथ मिलकर कहाः ‘तुम अनाचार में व्यस्त हमें सदाचार नहीं करने दे रहे हो। यह मंत्र, जिसका इसके पूर्व महान ऋषियों ने पठन किया है, हम इसे पवित्र मानते हैं।’ इस तरह मुनियों से वाद-विवाद करते हुए, अनाचार से प्रभावित होकर राजा ने मेरे (मुनि अगस्त) मस्तक पर अपना पैर रख दिया, जिसके कारण राजा की कीर्ति समाप्त हुई और साथ ही शक्ति भी नष्ट हो गई। जब एकाएक वह उत्तेजित हो गया, और भय से घबराया तब मैंने कहाः ‘हे मूर्ख, तुम उन पवित्र मंत्रों की निंदा करते हो जिनकी रचना पूर्व ऋषियों ने की है। यहीं नहीं, ब्रह्मा-समान स्तर वाले ऋषियों को अपना रथ

खींचने के लिए बाध्य करते हो। अतएव तुम अपनी कीर्ति तथा योग्यता खोकर स्वर्ग से उतरकर धरती पर निवास करो। तब आगे चलकर तुम एक हजार वर्षों तक धरती पर सांप की तरह घिसटते रहोगे और समय पूरा होने पर स्वर्ग में जाओगे।