64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कुशनाभ था। कुशनाभ गाधि का पिता था। गाधि विश्वमित्र का पिता था। इसी विश्वामित्र ने पृथ्वी पर हजारों वर्ष राज्य किया। एक बार जब वह पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था, वशिष्ठ के आश्रम जा पहुंचा। वशिष्ट का यह आश्रम अनेक ऋषि-मुनियों तथा भक्तों का निवास था। काफी अनुनय-विनय के बाद विश्वामित्र ने वशिष्ठ के अनुयायियों द्वारा किए गए आदर-सत्कार को स्वीकार कर लिया। बाद में वहां अदभुत गाय देखकर विश्वामित्र आश्चर्य में पड़ गया और अचानक उसके मन में गाय लेने का लालच आ गया। वह गाय कोई साधारण गाय नहीं थी, बल्कि आश्रमवासियों को दूध के साथ सभी तरह का खाना देती थी। पहले तो वशिष्ठ ने कहा कि इस गाय के बदले में हमारों साधारण गायें दे सकते हैं। साथ ही उन्होंने अधिकारपूर्ण स्वर में यह भी कहा कि यह गाय तो एक अनमोल रत्न है और रत्न राजा की संपत्ति होती है। इसलिए उस पर राजा का ही अधिकार है। राजा विश्वामित्र द्वारा गायों की संख्या में वृद्धि करने पर भी वशिष्ठ ने अस्वीकार कर दिया। तब उसी गाय के बदले राजा ने और कीमत बढ़ाई। लेकिन वशिष्ठ को यह भी स्वीकार न थी। उसने स्पष्ट इंकार करते हुए कह दिया कि किसी भी कीमत पर वे उस गाय को नहीं देंगे। राजा को यह सब सुनकर क्रोध आना ही था। अतः राजा ने कृतध्न और निर्दयी बनते हुए आगे बढ़कर गाय जबरन छीनी, लेकिन वह अदभुत गाय राजा के सेवकों के हाथों से निकल कर अपने मालिक के पास भाग कर आ गई और उससे शिकायत की कि वह उसे छोड़ना चाहता है इस पर वशिष्ठ ने उत्तर दिया कि वह उसे छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन विवश है क्योंकि राजा उससे कहीं अधिक शक्तिशाली है। तब गाय ने उत्तर दिया, ‘मनुष्य क्षत्रिय को शक्तिशाली नहीं मानते। ब्राह्मण उनसे अधिक शक्तिशाली होते हैं, ब्राह्मणों के पास दैवी शक्ति होती है जो क्षत्रियों की शक्ति से श्रेष्ठ है। उनकी शक्ति नापी नहीं जा सकती। विश्वामित्र यद्यपि अत्यंत प्रतापी हैं, लेकिन आपसे अधिक शक्तिशाली नहीं है। आपकी शक्ति अजेय है। मुझे इजाजत दो, क्योंकि मेरे अंदर ब्राह्मणत्व से पूर्ण बल है। मैं इस दुष्ट राजा का अहंकार तथा शक्ति को नष्ट कर दूंगी।’
तब इस गाय ने अपनी गर्जनी से सैकड़ों पहलवानों को पैदा किया जो राजा विश्वामित्र की सारी सेना को नष्ट कर देते हैं। लेकिन बाद में विश्वामित्र ने उन सबको मार गिराया। इस स्थिति से निपटने के लिए उस गाय ने हथियारबंद शक और यवनों का निर्माण किया जो राजा की सेना को लील गए। परंतु अंत में उनका भी राजा ने नाश कर दिया। इसके बाद उस गाय ने अपने शरीर के अंगों से बहुत से योद्धाओं को उत्पन्न किया, जिन्होंने विश्वामित्र के पैदल सैनिकों, हाथी, घोड़े, रथ आदि को ध्वस्त कर दिया। क्रोध में आकर राजा विश्वामित्र के सैंकड़ों पुत्रों ने विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों सहित वशिष्ठ पर हमला कर दिया। परंतु एक पल में ही वशिष्ठ ने उन्हें अपने मुंह की ज्वाला से जलाकर राख कर दिया। इस तरह पूर्ण रूप से पराजित हो जाने पर विश्वामित्र अपने एक पुत्र को साम्राज्य सौंप कर हिमालय की यात्रा पर चला गया, जहां उसने गहन तपस्या की और महादेव से दिव्य ज्ञान प्राप्त किया। महादेव ने उसकी तपस्या से प्रभावित होकर शस्त्रास्त्र विद्या का ज्ञान दिया। इससे विश्वामित्र घमंड से भर