70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को रंभा की नीयत पर संदेह हो गया और क्रोधित होकर शाप दिया। शाप ने अपना प्रभाव दिखलाया। इंद्र और कंदर्प निराश हो गए। यद्यपि विश्वामित्र ने अपनी वासना पर नियंत्रण रखा, लेकिन क्रोध पर नियंत्रण न रख पाने के कारण उसकी तपस्या नष्ट हो गई। उसे वही तपस्या फिर से आरंभ करनी पड़ी। अब वह बिल्कुल शांत रहने लगा, अर्थात् वर्षों तक उसने श्वास तक लेना बंद कर दिया_ तब उसने हिमालय को छोड़कर पूर्व की यात्रा की, जहां उसने एक भयानक प्रयोग किया और मौन धारण कर उसने एक हजार वर्षों तक तपस्या की। तपस्या के इतिहास में इस तरह का कोई दूसरा ऐसा उदाहरण नहीं मिलता। हालांकि इस दौरान बहुत-सी कठिनाइयां उसके रास्ते में आई, पर वह क्रोध से जरा भी विचलित नहीं हुआ और अंत में अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हुआ। तपस्या की अवधि की समाप्ति पर उसने खाने के लिए कुछ अन्न तैयार किया। इंद्र ने भिखारी के रूप में आकर भीख मांगी। विश्वामित्र को अपना भोजन देना पड़ा और उसे भूखे ही रहना पड़ा, क्योंकि उसने शांत रहने की प्रतिज्ञा की थी। ‘चूंकि उसने श्वास न लेने की प्रक्रिया जारी रखी, उसके सिर से धुआं निकलने लगा, जिसके कारण तीनों संसार त्रस्त और भयभीत हो गए।’ तब देवताओं और ऋषिओं ने कहा, ‘इस महान मुनि विश्वामित्र को अनेक प्रकार से प्रलोभित तथा उत्तेजित करने के प्रयास किए गए, लेकिन इन सभी बाधाओं को पार करते हुए वह अपनी सिद्धि की ओर बढ़ता जा रहा है। इस बारे में यह भी कहना जरूरी है कि यदि उसकी इच्छा न मानी गई तो वह अपनी तपस्या के प्रभाव से तीनों लोक नष्ट कर सकता है। संपूर्ण सृष्टि त्रस्त है। कहीं पर भी कोई उजाले की किरण दिखाई नहीं दे रही। समुद्र डांवाडोल हो रहे हैं, पहाड़ चूर-चूर हो रहे हैं। धरती कांप रही है और हवा भ्रमित होकर बह रही है। हे ब्रह्मा! हमें वचन दो कि मानव सृष्टि नास्तिक नहीं बनेगी। .... इससे पूर्व कि उग्र स्वभाव का वह महान और कीर्तिमान ऋषि सब-कुछ नष्ट कर दे, हमें उसे प्रसन्न करना चाहिए। तब देवताओं ने ब्रह्मा के नेतृत्व में विश्वामित्र से प्रार्थना कीः ‘हे ब्राह्मण ऋषि, हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं। हे कुशिक, तुमने अपने धैर्य से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया है। हे ब्रह्मण, अपने मारुतों के साथ हम तुम्हें दीर्घायु प्रदान करते हैं। प्रत्येक आर्शीवाद तुम्हें प्राप्त हो, तुम जहां चाहे, जा सकते हो।’ इससे प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने देवताओं को प्रणाम किया और कहाः ‘यदि मैंने ब्रह्मत्व प्राप्त कर लिया है, तब ओइम् और यज्ञ सूत्र तथा वेद मुझे इस योग्यता में मान्यता प्रदान करें और ब्राह्मण का पुत्र वशिष्ठ, जो कि छात्र विद्या तथा ब्रह्मण विद्या आदि सभी क्षेत्रों में पूर्ण रूप से निपुण माना जाता है, वह भी मुझे इसी प्रकार संबोधित करे।’ तदनुसार देवताओं ने वशिष्ठ से प्रार्थना की और उसने विश्वामित्र के साथ समझौता कर लिया। साथ ही ब्राह्मण ऋषि के पद पर उसका अधिकार स्वीकृत कर लिया। ..... विश्वामित्र ने भी ब्राह्मण की श्रेणी प्राप्त करने के लिए वशिष्ठ का पूर्ण सम्मान किया।