72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थे। उन्होंने उर्व से कहा कि वह अपने क्रोध पर नियंत्रण रखे और जो पापपूर्ण कार्य वह कर रहा है, उससे दूर रहे। ‘हे पुत्र! तुम क्षत्रियों और इन सातों लोकों का नाश मत करो। अपने क्रोध को नियंत्रित करो, क्योंकि वह तपस्या की साधना को नष्ट कर देता है।’ लेकिन उर्व ने उन्हें उत्तर दिया कि वह अपने निश्चय पर अमल किए बिना नहीं रुक सकता। उसने कहा कि उसके क्रोध का अगर किसी दूसरी वस्तु पर आघात नहीं होगा तो वह स्वयं उसी को नष्ट का देगा। उसने तर्क देते हुए कहा कि उसके पूर्वजों ने क्षत्रियों के साथ जिस नम्रता का व्यवहार करने का परामर्श दिया है, वह न्याय, औचित्य तथा कर्तव्य के आधार पर भी गलत है_ तथापि पितरों ने उसे अपने क्रोध की अग्नि समुद्र में फेंक देने के लिए मना किया जहां, उन्होंने कहा, वह जल-तत्वों पर प्रहार करेगी, और इस प्रकार उसकी धमकी पूरी हो जाएगी।
तीसरी घटना ब्राह्मनों द्वारा क्षत्रियों के नर-संहार से संबंधित है। महाभारत में अनेक स्थानों पर इस कथा को दोहराया गया है।
सहस्त्रबाहु महाप्रतापी एवं शक्तिमान कार्त्तवीर्य यानी अर्जुन इस संपूर्ण संसार का सम्राट था। वह महिषमति का निवासी था। अपार शक्ति का यह हैहय राजा महासागरों तथा महाद्वापों सहित सपूंर्ण विश्व पर राज्य करता था। युद्ध भूमि पर लड़ने और संपूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने के लिए उसने हजार हाथों से लड़ने का वरदान दत्तात्रेय मुनि से प्राप्त किया था तथा पथभ्रष्ट होने की संभावना में सदाचारी लोगों के उपदेश और वचनों का आशीर्वाद उसे प्राप्त था। तत्पश्चात् अपने सूर्य जैसे तेजस्वी रथ पर सवारी करते हुए अपने गर्व के नशे में चूर होकर उसने कहा, ‘धैर्य, साहस, कीर्ति, पराक्रम, गुण और शक्ति में मेरे समान कौन है?’ उसकी चुनौती के उत्तर में आकाश में एक निराकरा आवाज गूंज उठी, जिसने उससे कहा - ‘हे मूर्ख! तुम नहीं जानते कि ब्राह्मण क्षत्रिय से उत्तम होता है और ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय अपनी प्रजा पर शासन करता है।’
तब अर्जुन ने उत्तर दिया, ‘यदि मैं चाहूं तो प्राणी मात्र का निर्माण कर सकता हूं अथवा न चाहूं तो समस्त प्राणियों को मिटा सकता हूं। कोई भी ब्राह्मण किसी कार्य या विचार अथवा धारणा में मुझसे श्रेष्ठ नहीं हो सकता। तुम्हारा कहना है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ है, और मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि क्षत्रिय श्रेष्ठ है_ दोनों का आधार यहां स्पष्ट हुआ है, परंतु भेद की बात यह भी है कि ब्राह्मण क्षत्रिय पर निर्भर होते हैं, न कि क्षत्रिय ब्राह्मण पर। ब्राह्मण के लिए वेद मात्र एक मूल बहाना है। न्याय, रक्षा के लिए वे क्षत्रिय के अधीन है। ब्राह्मण अपनी जीविका उनसे ही प्राप्त करते हैं तब, ब्राह्मण उनसे श्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं? मैं स्वयं उन सर्व प्रमुख ब्राह्मणों को अपने अधीन रखता हूं, जो दक्षिणा पर जीवित रहते हैं और अपने आपको बहुत श्रेष्ठ मानते हैं। क्योंकि