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हिंदुत्व का दर्शन

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स्वर्ग में निवास करने वाली गायत्री देवी ने सत्य का ही उद्घाटन किया है, इसलिए मैं उन सभी अनाधीन रहने वाले ब्राह्मणों को अपने अधीन करके रहूंगा। इन तीनों लोगों में कोई भी मनुष्य अथवा देवता मुझे राजा के पद से हटा नहीं सकता। इसलिए मैं हर ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूं। तो अब क्या मैं इस संसार को, जहां ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, ऐसे विश्व में बदल दूं, जहां क्षत्रिय श्रेष्ठ हो सकें, क्योंकि युद्ध में मेरा मुकाबला करने का किसी को साहस नहीं है।’ अर्जुन का यह कथन सुनकर रात्रि के समय भ्रमण करने वाली यह देवी भयभीत हो गई तब हवा में विचारण करने वाले वायु देवता ने अर्जुन से कहाः ‘इस पापयुक्त विचार का त्याग करो और ब्राह्मणों का अभिवादन करो। यदि तुमने उनके साथ कोई दुर्व्यवहार किया तो तुम्हारा साम्राज्य अस्थिर हो उठेगा। तब तुम देश से बाहर कर दिए जाओगे।’ राजा ने पूछा, ‘तुम कौन हो,’ मैं देवताओं का दूत वायु हूं और तुम्हें तुम्हारे हित की बातें बताने आया हूं। अर्जुन ने प्रत्युत्तर में कहाः ‘हे देवता! तुम आज ब्राह्मणों के प्रति बहुत अधिक भक्ति भाव दिखा रहे हो। लेकिन यह क्यों नहीं करते कि ब्राह्मण भी पृथ्वी पर जन्मे किसी अन्य प्राणी के समान ही हैं।’

आगे चलकर राजा, जमदग्नि ऋषि के पुत्र परशुराम के साथ एक विवाद में पड़ गया जो इस तरह हैः

कान्यकुब्ज का एक राजा था, जिसे गाधि नाम से जाना जाता था उसकी सत्यवती नाम की एक पुत्री थी। इस राजकुमारी का ऋचीक ऋषि के साथ विवाह और जमदग्नि के जन्म की कहानी ऊपर वर्णित कहानी के समान ही है। जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र थे, जिनके सबसे छोटा दुर्जेय परशुराम था। उसने एक बार अपने पिता के आदेश पर अपनी मां की हत्या कर दी (जिसने अनैतिक इच्छा के मोह से अपनी पूर्व पवित्रता खो दी थी) क्योंकि जमदग्नि के चार बड़े पुत्रों ने मातृहत्या करने से मना कर दिया था और पिता के शाप से उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी, लेकिन परशुराम की इच्छा से उसके पिता ने उसकी मांग को पुनः जीवनदान दिया और उसके भाइयों को भी सदबुद्धि प्रदान की तथा स्वयं उसे हत्या के अपराध से मुक्त कर दिया जाता है। परशुराम अपने पिता से अजयेता तथा दीर्घायु का वर भी प्राप्त करता है राजा अर्जुन (या कार्त्तवीर्य) के साथ उसके संबंध का वर्णन है। एक बार राजा अर्जुन जमदग्नि के आश्रम में आया और उसका जमदग्नि की पत्नी के आदर के साथ स्वागत किया। लेकिन राजा ने ऋषि के यज्ञ की गाय का बछड़ा जबरन छीनकर और यज्ञ समारोह के वृक्ष तोड़कर आदर-सत्कार को भंग कर दिया। इस विनाश का समाचार सुनकर परशुराम बहुत ही क्रोधित हो गया। उसने अर्जुन पर आक्रमण करके उसकी हजार भुजाएं काटीं। फिर उसकी हत्या कर डाली। इसके बदले में अर्जुन के पुत्रों ने शांत स्वभाव वाले ऋषि जमदग्नि की परशुराम की अनुपस्थिति में हत्या कर दी।