1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 89

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वापस लौटने पर अपने पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए परशुराम ने संपूर्ण क्षत्रिय वंश को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की और सबसे पहले अर्जुन के पुत्र और उनकी साथियों की हत्या करके उस प्रतिज्ञा का पालन किया। उसने इक्कीस बार समस्त क्षत्रियों को पृथ्वी से समूल नष्ट किया, और उनके खुन से सामंतपंचक में पांच सरोवर बनवाए, जिसमें उसने भृगुओं के पितरों की आत्माओं को संतुष्ट किया और अपने नाना ऋचिका के समक्ष जाकर खड़ा हो गया। तब ऋचिका ने उसे उपदेश दिया। परशुराम ने एक विशाल यज्ञ करके इंद्र को प्रसन्न किया और यज्ञ करने वाले पुरोहितों को पृथ्वी दान दी। उसने महाबली कश्यप ऋषि को साठ फुट लंबा और चौवन फंट ऊंचा सोने का सिंहासन दान में दिया। इस सिंहासन को ब्राह्मणें ने आपस में बांट लिया, जिसे उसका

खंडववन नाम पड़ गया। इस प्रकार, कश्यप को पृथ्वी दान करके, परशुराम स्वयं महेन्द्र पर्वत पर रहने के लिए चला गया। इस तरह उसमें और क्षत्रियों के बीच में शत्रुता उत्पन्न हुई, और परशुराम ने अपनी असीमित शक्ति से पृथ्वी जीत ली।’

जिन क्षत्रियों की परशुराम द्वारा हत्या की गई, उनका वर्णन महाभारत के द्रोण पर्व में है। वे काश्मीर, दार्द कुंती, शुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग, विदेह, ताम्रलिप्तक मर्त्तिकावत, सीवी आदि राजन्य थे।

क्षत्रिय वंश का पुनर्निर्माण किस प्रकार किया गया, यह बात भी ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रियों के नरसंहार की इस कहानी में बताई है, कहा जाता हैः

पृथ्वी पर रहने वाले सभी क्षत्रियों को इक्कीस बार नष्ट करने के बाद, जमदग्नि का यह पुत्र (परशुराम) सभी पर्वतों में सर्वोत्तम महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने में व्यस्त हो गया। क्षत्रियों की विधवाएं संतति की इच्छा से ब्राह्मणों के पास आईं। तब ब्राह्मणों ने काम-वासना की किसी भी लालसा से मुक्त होकर उचित ऋतु में इन स्त्रियों के साथ संभोग किया। बाद में वे गर्भवती हो गईं। उनसे वंश को चलाने के लिए शूरवान क्षत्रिय लड़के-लड़कियां उत्पन्न हुए। इस प्रकार ब्राह्मणों ने अपने सदाचार से क्षत्रिय स्त्रियों से क्षत्रिय वंश का सिलसिला आगे बढ़ाया जिनकी बाद में संख्या बड़ी और वे अनेक वर्षों तक जीवित रहे। इसके बाद ही ब्राह्मणों से कम श्रेष्ठता वाले चार वर्ण उत्पन्न हुए।

भारत के अलावा किसी भी अन्य देश में वर्ग-संघर्ष का ऐसा दुखांत इतिहास नहीं मिलता। यह ब्राह्मण परशुराम का झूठा दंभ ही है कि उसने क्षत्रियों की पुनर्सष्टि की।

हमें ऐसा नहीं मानना चाहिए कि भारत के वर्ग-संघर्ष का यह इतिहास प्राचीन है, बल्कि यह वर्ग-संघर्ष निरंतर जारी है। इस वर्ग-संघर्ष का हम महाराष्ट्र में मराठा शासन के समय में भी देख सकते हैं, जिसके कारण मराठा साम्राज्य नष्ट हो गया। हमें यह भी नहीं मानना चाहिए कि यह वर्ग-युद्ध के समान ही होते थे। भारत में वर्ग-संघर्ष का एक स्थायी स्वभाव रहा है, जो चुपचाप किन्तु निश्चित रूप से अपना कार्य करता था।