हिंदुत्व का दर्शन
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इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह वास्तविक घटनाएं इस अर्थ में सांकेतिक हैं कि वे उनकी प्रकृति तथा चरित्र की ओर इंगित करती हैं। क्या इसी बात से कहा जा सकता है कि हिंदुओं में बंधुभाव है? इन घटनाओं को देखते हुए इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर संभव नहीं।
हिंदू समाज में बंधुभाव के अभाव का क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है? हिंदू धर्म और उसका दर्शन ही इस बात के लिए जिम्मेदार है। जैसा कि मिल ने कहा है, बंधुभाव की भावना स्वाभाविक होती है। लेकिन यह एक ऐसा पौधा है कि जो अनुकूल जमीन है ही तथा जहां उसके विकास के लिए उचित परिस्थितियां मौजूद होती हैं, बढ़ सकता है। बंधुभाव की भावना को बढ़ाने के लिए केवल यह उपदेश करने की आवश्यकता नहीं कि हम सभी ईश्वर की संतान हैं अथवा हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं यह मौलिक आवश्यकता नहीं है। किसी भावना के विकास के लिए यह एक बहुत ही बौद्धिक तर्क हो सकता है। बंधुभाव की इस भावना को बढ़ावा देने के लिए जीवन की सभी सजीव प्रक्रियाओं में सहभागी बनना आवश्यक है। जन्म, मृत्यु, विवाह तथा भोजन आदि के सुख-दुख में हिस्सेदार बनने से बंधुत्व की भावना बढ़ती है अतः जो इन प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं, वे एक दूसरे को भाई के समान मानते हैं।
प्रो. स्मिथ ने सहभोज के महत्व पर उचित जोर देते हुए समाज में बंधुभाव के निर्माण में इसे एक अत्यंत आवश्यक तत्व माना है। वे कहते हैंः
यज्ञ समारोह में आयोजित सहभोज प्राचीन धार्मिक जीवन के आदर्श को
व्यक्त करने का एक उचित माध्यम है। ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि वह
एक सामाजिक कर्म है और उसमें देवता तथा उनके उपासक, दोनों न केवल
एक साथ भाग लेते हैं बल्कि, जैसा पहले बताया गया है, किसी मनुष्य के
साथ मिल-बैठकर खान-पान करना इसके साथ भाईचारा व्यक्त करने तथा
परस्पर सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने का भी प्रतीक है। यज्ञ-समारोह में
आयोजित सहभोज में एक बात सीधी व्यक्त होती है कि देवता तथा उसके
उपासक, दोनों एक ही पंक्ति में साथ-साथ भोजन करते हैं। लेकिन इसके
अलावा उनमें उन सभी बातों का समावेश होता है जो उनके परस्पर संबंधों
को व्यक्त करती है। जो लोग भोजन के लिए एक-साथ बैठते हैं, वे लोग
सभी सामाजिक कार्यों के लिए एकजुट होते हैं। जो लोग सहभोज नहीं कर
सकते, वे एक-दूसरे के लिए पराये होते हैं। न उनमें धार्मिक एकता होती
है और न परस्पर सामाजिक कर्तव्य। ख्1,
- दि रिलीजन आफ सैमाइट्स, पृ. 269