76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों पर भी हिंदूओं में सुख-दुख को बांटने की भावना नहीं है हर चीज अलग-अलग और विशिष्ट है। हिंदू अलग है, और जीवनपर्यन्त विशिष्ट बना रहता है। भारत में आने वाले विदेशी को ‘हिंदू पानी’, ‘मुसलमान पानी’ की ही पुकार नहीं सुनाई देती। जो ब्राह्मण काफी हाउस, ब्राह्मण भोजनालय - जहां अब्राह्मण हिंदू नहीं जा सकते, ब्राह्मण प्रसुति गृह, मराठा प्रसूति गृह, और भाटिया प्रसूति गृह आदि मिलते हैं, हालांकि ब्राह्मण, मराठा और भाटिया सभी हिंदू हैं यदि किसी ब्राह्मण के घर में बच्चे का जन्म होता है_ तब अब्राह्मण को नहीं बुलाया जाता है औन न ही उसे वहां जाने की इच्छा होगी। यदि ब्राह्मण परिवार में विवाह हो, तब भी गैर-ब्राह्मण को निमंत्रण पत्र नहीं भेजा जाता और तो और, ब्राह्मण की मृत्यु हो जाने पर उसकी शव-यात्रा में कोई भी अब्राह्मण सम्मिलित होने का अधिकारी नहीं है। इस तरह से एक जाति से सुख-दुख दूसरी जाति के सुख-दुख नहीं होते। एक जाति को दूसरी जाति के प्रति लगाव नहीं होता। इतना ही नहीं, दान-धर्म भी जाति तक ही सीमित होता है। हिंदुओं में ऐसी कोई सार्वजनिक दान-धर्म की प्रथा नहीं है, जो सबके लिए मुक्त हों आप ब्राह्मणों के लिए ब्राह्मण धर्मदान संस्था पाएंगे और इसमें भी चित्तपावन ब्राह्मणों के लिए चित्तपावन ब्राह्मण धर्मदान संस्था, देशस्थ ब्राह्मनों के लिए देशस्थ ब्राह्मण धर्मदान संस्था। करहाड़े ब्राह्मणों के लिए करहाड़ ब्राह्मण संस्था, जो सारस्वत ब्राह्मणों में भी कुंडलेश्वर ब्राह्मण धर्मदान संस्था आदि। इस प्रकार एक हिंदू दूसरे हिंदू के साथ जीवित रहते हुए भी कोई वस्तु आपस में नहीं बांटता। बात यहीं तक नहीं जब वे मर जाते हैं, तब भी वे अलग और पृथक ही रहते है। कुछ हिंदू अपने मृतकों को दफनाते हैं, तो कुछ हिंदू उन्हें जलाते हैं। लेकिन जो लोग दफनाते हैं, उनकी श्मशान भूमि एक नहीं होती। प्रत्येक का श्मशान भूमि में अपने मृतकों को दफनाने का अलग-अलग क्षेत्र होता है जो लोग जलाते हैं, वे एक ही स्थान पर अपने मृतकों को नहीं जलाते। यदि वे ऐसा करते भी हैं तो भी चबूतरा अलग बनाया जाता है।
तब इस बात में क्या कोई आश्चर्य है कि हिंदुओं के लिए बंधुभाव की भावना क्यों पराई है? जीवन के सुख-दुख को आपस में बांटने पर जहां पूर्ण मनाही हो, वहां बंधुभाव की भावना कैसे पनप सकती है?
लेकिन इन सभी सवालों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हिंदु लोग जीवन के सुख-दुख आपस में बांटने से क्यों इंकार करते हैं? यहां यह बताना, आवश्यक नहीं है कि वे इन्हें बांटने से इसलिए इंकार करते हैं, क्योंकि उनका धर्म उन्हें ऐसा ही करने के लिए कहता है। हिंदू धर्म शिक्षा देता है सहभोज न करने की, अंतर्विवाह न करने की, और परस्पर संबंध न रखने की। यह नहीं करना, वह नहीं करना, यहीं हिंदू धर्म के उपदेश का सार है। सभी लज्जित करने वाली बातें जो मैंने यहां बताई हैं, हिंदू समाज की अलग और पृथक प्रवृत्ति को स्पष्ट करती है, जो हिंदु धर्म के दर्शन