हिंदुत्व का दर्शन
की देन है। यही दर्शन बंधुभाव को पूरी तरह नकारता है।
77
न्याय की दृष्टि से हिंदुत्व के दर्शन का किया गया यह संक्षिप्त विश्लेषण सिद्ध करता है कि हिंदू धर्म समानता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का विरोधी है।
बंधुत्व और स्वतंत्रता, यह दोनों तत्व सही मायने में धारणाएं हैं। मौलिक तथा बुनियादी तत्व हैं समानता और मानव व्यक्तित्व के प्रति आदर। बंधुभाव तथा स्वतंत्रता, यह दोनों धारणाएं इन मूल तत्वों से ही आगे बढ़ती हैं। इस बात को हम ऐसे भी कह सकते हैं कि समानता मूल धारणा और मानव व्यक्तित्व के प्रति आदर है। तब जहां समानता को नकारा गया है, तब यह मानना चाहिए कि अन्य सभी बातों को भी नकारा गया है। दूसरे शब्दों में, यह बात दर्शाना मेरे लिए पर्याप्त है कि हिंदुत्व में समानता नहीं थी लेकिन जिस प्रकार से मैंने हिंदुत्व का परीक्षण किया वैसा पहले नहीं किया गया था, और तब मैंने सोचा कि हिंदुत्व बंधुत्व और स्वतंत्रता, दोनों से वंचित रखने वाला है, यह कहना ही पर्याप्त नहीं है।
लार्ड एक्टन की महत्वपूर्ण धारणा के परीक्षण के साथ में अपनी चर्चा समाप्त करना चाहूंगा। महान लार्ड महोदय कहते हैं कि असमानता की बढ़ोतरी ऐतिहासिक परिस्थिति के कारण होती है। धर्म के स्वीकृत मत के रूप में इस पर कभी पालन नहीं किया गया। यह स्पष्ट है कि अपना यह मत बनाते समय लार्ड एक्टन ने हिंदू धर्म की और ध्यान नहीं दिया, क्योंकि हिंदु धर्म में असमानता एक स्वीकृत धार्मिक सिद्धांत हैं और उसे जान-बूझकर एक पवित्र धर्म मत के रूप में प्रचारित किया जाता है वह एक अधिकृत धार्मिक तत्व है और कोई भी सरेआम उसका पालन करने में लज्जा अनुभव नहीं करता। हिंदू समाज की दृष्टि से असमानता धार्मिक सिद्धांत के रूप में जीवन का एक धर्म-सम्मत विधान है और एक निश्चित मत के रूप में निरंतर इसकी शिक्षा दी गई है। यह एक अधिकृत मत है। वस्तुतः असमानता हिंदू धर्म की आत्मा है।
अब मैं उपयोगिता के दृष्टिकोण से हिंदू धर्म के दर्शन का परीक्षण करना चाहूंगा।
हिंदू धर्म का इस पहलू से परीक्षण बहुत दीर्घ तथा विस्तार से करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जैसा प्रो. मिल ने निर्देशित किया है, न्याय तथा उपयोगिता में आपसी शत्रुता आवश्यक नहीं है। दूसरे शब्दों में जो बात एक व्यक्ति के लिए अन्याय है, वह समाज के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। इसके अलावा हमारे सामने जातिप्रथा के परिणाम भी हैं, जिनसे हम अपरिचित नहीं हैं।
जाति का सिद्धांत एक सिद्धांत नहीं है। इस सिद्धांत को व्यवहार में ढाला गया, इसलिए वह एक वास्तविकता है। इसके कारण हिंदू समाज ने चातुवेर्ण्य के संबंध में जर्मन दार्शनिक नीत्शे का सही अनुसरण किया है, जिसने कहा है कि ‘आदर्श को अनुभव करो और वास्तविकता को आदर्श में ढाल दो।’