1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 93

78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किसी भी सिद्धांत का मूल्य उसके नतीजों से परखना चाहिए। इसलिए, यदि अनुभव को एक कसौटी मानना है, तब चातुर्वर्ण्य का तिरस्कार जरूरी है। एक शुद्ध सामाजिक संगठन के रूप में भी यह तिरस्कार है उत्पादकों के संगठन के रूप में भी उसका तिरस्कार किया जाना चाहिए। बंटवारे की एक आदर्श योजना के रूप में भी वह बुरी तरह से असफल हो गया है। यदि संगठन का यह एक आदर्श रूप है, तब हिंदु धर्म एक समान मंच क्यों नहीं बना सका? यदि उसे उत्पादन का एक आदर्श नमूना माना जाए, तब यह कैसे है कि उत्पादन की उसकी तकनीक आदिमानव की तकनीक से अधिक विकसित नहीं हो सकी और यदि इसे बंटवारे की एक आदर्श योजना माना जाए, तब इसके कारण धन की इतनी अधिक असमानता कैसे उत्पन्न हो गई, जहां एक ओर असीमित संपत्ति है तो दूसरी ओर असीमित गरीबी।

परंतु मैं इस विषय को इतने संक्षेप रूप में कहकर छोड़ना नहीं चाहता, क्योंकि मैं जानता हूं कि ऐसे अनेक हिंदु जन है, जो जाति-व्यवस्था की महान सामाजिक उपयोगिता का दावा करते हैं, और ऐसी व्यवस्था के न केवल निर्माण, बल्कि उसे दैवी मान्यता प्रदान करने के लिए मनु की बुद्धिमानी तथा विवेक की प्रशंसा करते हैं। जाति व्यवस्था के प्रति ऐसा दृष्टिकोण इसलिए बना, क्योंकि जाति के अलग-अलग पहलुओं पर अलग-अलग विचार किया गया।

जाति की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता के परिणाम को तभी निश्चित किया जा सकता है, जब जाति के विभिन्न पक्षों को संयुक्त कर उन पर विचार किया जाए। समस्या का इस दृष्टिकोण से विचार करने पर निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैंः

(1) जाति से श्रमिकों का विभाजन होता है, (2) जाति के कारण मनुष्य की उसके कार्य के प्रति रूचि नहीं रहती, (3) जाति के कारण बुद्धि का शारीरिक श्रम से संबंध नहीं रहता, (4) जाति मनुष्य की प्रमुख रुचि को विकसित करने के उसके अधिकार को नकारती है, जिसके कारण वह निर्जीव बनता है, और (5) जाति स्थान परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाती है।

जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं है निस्संदेह सभ्य समाज में श्रम का विभाजन आवश्यक होता है। लेकिन किसी भी सभ्य समाज में श्रम-विभाजन के साथ श्रमिकों को अपरिवर्तनीय अप्राकृतिक विभाजन नहीं किया जाता। जाति-व्यवस्था केवल श्रमिकों का विभाजन करने वाली व्यवस्था नहीं है जो कि श्रम के विभाजन से सर्वथा भिन्न है, बल्कि वह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें श्रमिकों में विभाजन की श्रेणी एक दूसरे को ऊपर निर्धारित की गई है। किसी भी देश में श्रम के विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का इस प्रकार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजन नहीं किया गया है। जाति-व्यवस्था के इस पहलू के संबंध में आलोचना करने का एक तीसरा