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हिंदुत्व का दर्शन

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दृष्टिकोण भी है। श्रम का यह विभाजन अपने आप नहीं हो गया, और न ही यह किसी स्वाभाविक योग्यता पर आधारित है। सामाजिक तथा निजी कार्यक्षमता के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि किसी भी व्यक्ति की योग्यता को निपुण बनाए, जिससे वह अपने जीवन-व्यवसाय का चयन कर सके और उसे सुदृढ़ बना सके। जाति व्यवस्था में इस सिद्धांत का उल्लंघन होता है, क्योंकि इसमें किसी भी व्यक्ति का कार्य उसके जन्म से पहले ही तय हो जाता है_ उसका चुनाव उसकी मौलिक योग्यता के आधार पर नहीं, किन्तु उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर पर आधारित होता है। एक अन्य दृष्टिकोण से देखें तो व्यवसायों के क्रमिक वर्गीकरण की व्यवस्था, जो कि जाति व्यवस्था का सीधा परिणाम है, निश्चय ही हानिकारक है। उद्योग कभी भी स्थिर नहीं रहते। उनमें तीव्र तथा आकस्मिक परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों के साथ-साथ व्यक्ति को भी अपने व्यवसायों में परिवर्तन की अनुमति होनी चाहिए। बदलाव की स्थिति में अगर उसे अपने-आपको बदलने की अनुमति नहीं दी जाएगी तो उसके लिए अपनी आजीविका प्राप्त करना असंभव हो जाएगा। परंतु जाति-व्यवस्था हिंदू जनों को ऐसे व्यवसाय करने की अनुमति नहीं देती जो वंश-परंपरा के अनुसार उनके अपने व्यवसाय न हों। यदि किसी हिंदू को हम कोई ऐसा नया व्यवसाय, जो उसकी जाति के लिए निर्धारित नहीं है, अपनाने के बजाए भूखा मरते हुए देखते हैं, जो उसकी कारण जाति-व्यवस्था में ही मिलती है। व्यवसायों में परिवर्तन करने की अनुमति न देने से जाति-व्यवस्था देश की वर्तमान बेरोजगारी के लिए सीधी जिम्मेदार बन गई। श्रम विभाजन को लेकर जाति-व्यवस्था में और भी एक गंभीर दोष है। जाति-व्यवस्था ने श्रम का जो विभाजन किया है, वह चयन के अधिकार पर आधारित नहीं है। उसमें किसी प्रकार की व्यक्तिगत भावना तथा पसंद-नापसंद का कोई स्थान नहीं है। वह पूर्ण रूप से भाग्य के सिद्धांत पर आधारित है। सामाजिक दक्षता पर विचार करने पर हम इस बात को स्वीकार करने के लिए बाध्य होंगे कि किसी भी औद्योगिक व्यवस्था में गरीबी और दुख इतनी बड़ी बुराई नहीं है, जितना कि यह वास्तविकता कि बहुत से लोगों को ऐसे व्यवसाय करने के लिए मजबूर किया जाता है जिनमें उनकी कोई रुचि नहीं होती। ऐसे व्यवसाय उनमें निरंतर घृणा, हीनभावना और कार्य से दूर भागने की प्रवृत्ति उत्पन्न करते हैं। भारत में ऐसे अनेक व्यवसाय हैं, जिन्हें हिंदू लोग हीन स्तर के व्यवसाय मानते हैं और जिसके कारण ऐसी व्यवसाय करने वालों के प्रति घृणा के लिए उकसाते हैं। ऐसे व्यवसायें को टालने की, और उनसे बचने की निरंतर इच्छा उत्पन्न होती रहती है। उसका मुख्य कारण यह है कि जो लोग इन व्यवसायों का अनुसरण करते हैं, उनकी हिंदू धर्म के द्वारा जो उपेक्षा होती है और उन पर ऐसे कार्यों को जिस प्रकार थोपा जाता है, उससे उनके मन में विफलता की भावना उत्पन्न होती है।