1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जाति व्यवस्था ने जो दूसरी हानि की है, वह यह है कि उसने बुद्धि का कार्य से संबंध तोड़ दिया है और श्रम के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न की है। जाति का सिद्धांत यह है कि ब्राह्मण, जिसे बुद्धि का विकास करने की अनुमति है, उसे श्रम करने की अनुमति नहीं है, वस्तुतः उससे श्रम की हीन मानने की शिक्षा दी जाती है जब किसी शूद्र की श्रम करने की अनुमति है, परंतु अपनी बुद्धि का विकास करने की अनुमकत नही है। इसके जो भयंकर परिणाम हुए, उनका उत्तम चित्र आर.सी. दत्ता ने अंकित किया है....। ख्1,

जाति, मनुष्य को निर्जीव बनाती है। वह मनुष्य को निष्फल बनाने की प्रक्रिया है। शिक्षा, संपत्ति तथा परिश्रम सभी के लिए आवश्यक है, यदि व्यक्ति एक स्वतंत्र तथा परिपूर्ण मनुष्य बनना चाहता है, संपत्ति एवं परिश्रम के बिना शिक्षा का होना व्यर्थ है। उसी प्रकार शिक्षा तथा परिश्रम के बिना संपत्ति को होना व्यर्थ है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इनमें से हर चीज आवश्यक है। यह सभी बातें मनुष्य मात्र के विकास के लिए आवश्यक हैं।

ब्राह्मण को ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, क्षत्रिय को शस्त्र चलाने की शिक्षा लेनी चाहिए, वैश्य को व्यापार करना चाहिए और शूद्र को सेवा करनी चाहिए - यह सब, परिवार में परस्पर निर्भरता का जो सिद्धांत निहित है, उस रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह पूछा जाता है कि एक शूद्र को धन प्राप्त करने की क्या आवश्यकता है, जब अन्य तीनों वर्ग उसकी सहायता करने के लिए मौजूद हैं? शूद्र को शिक्षा प्राप्त करने की क्या आवश्यकता है जब जरूरत होने पर पढ़ने-लिखने के लिए वह ब्राह्मण के पास जा सकता है? जब क्षत्रिय उसकी रक्षा करने के लिए तैयार हैं, तब उसे शस्त्र धारण करने की क्या आवश्यकता है? चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत को इस अर्थ से समझते हुए कहा जा सकता है किस समाज में शूद्र को एक रक्षित व्यक्ति के रूप में, और अन्य तीनों वर्गों को उसके रक्षक के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार का अर्थ लगाने से यह एक सरल तथा प्रलोभित करने वाला सिद्धांत बन जाता है। चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत के पीछे यही सही दृष्टिकोण है, ऐसा जानते हुए भी मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह व्यवस्था न तो अपने-आप में एक परिपूर्ण व्यवस्था है, और न ही छलपूर्ण उद्देश्य से मुक्त है। यदि ब्राह्मण, ज्ञान प्राप्त करने में, क्षत्रिय सैनिक बनने में और वैश्य व्यवसाय करने में असफल हो जाए, तब कैसी स्थिति उत्पन्न होगी? इसके अलावा यदि वे अपना कार्य करते भी हैं, परंतु शूद्र के प्रति अथवा एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों का पालन नहीं करते, तब भी कैसी स्थिति उत्पन्न होगी? यदि वह तीनों वर्ण शूद्र को किसी न्यायोचित आधार पर सहायता करने से इंकार करते हैं अथवा उसका दमन करने के लिए एकत्रित हो जाते

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