1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 96

हिंदुत्व का दर्शन

81

हैं, तब उसकी अवस्था कैसी हो जाती है? तब शूद्रों के हितों की रक्षा कौन करेगा? अथवा इसी संदर्भ में वैश्य अथवा क्षत्रिय के हितों की रक्षा कौन करेगा, जब उनके सीधेपन का कोई ब्राह्मण लाभ उठाने का प्रयास करता है? शूद्र की अथवा इस संबंध में ब्राह्मण अथवा वैश्व की स्वतंत्रता की रक्षा कौन करेगा, यदि क्षत्रिय ही उनके इस अधिकार को छीनने का प्रयास करता है। एक वर्ग की दूसरे वर्ग पर परस्पर निर्भरता को टाला नहीं जा सकता है। एक तरफा ही नहीं, एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर निर्भर रहने के लिए कभी-कभी अनुमति प्रदान करना आवश्यक हो जाता है। परंतु एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति पर उसकी सभी अत्यावश्यक जरूरतों के लिए निर्भर क्यों रखा जाता है? शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को मिलनी चाहिए। अपनी रक्षा के साधन प्रत्येक के पास होने चाहिएं। अपने स्व-संरक्षण के लिए प्रत्येक मनुष्य की यह अत्यंत महत्वपूर्ण जरूरते हैं। उनका पड़ोसी शिक्षित तथा शस्त्रधारी है, यह बात उस व्यक्ति के लिए, जो स्वयं अशिक्षित तथा निःशस्त्र है, किसी प्रकार उपयोगी हो सकती है? यह संपूर्ण सिद्धांत ही निरर्थक है। ये कुछ ऐसे प्रश्न है, जिनकी चातुर्णर्य का समर्थन करने वालों को कोई चिंता नहीं है। परंतु यह बहुत ही उचित प्रश्न है। चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत के पीछे भिन्न-भिन्न वर्गों में रक्षित तथा रक्षक का संबंध होने की भावना निहित है, इस बात को जानते हुए भी हमें यह स्वीकार करना होगा कि यदि रक्षक के बुरे कार्य से रक्षा का कोई प्रबंध नहीं है तो इसमें रक्षित व्यक्ति के हितों की हानि ही होगी। चातुर्वर्ण्य की वास्तविक मूल भावना में रक्षित तथा रक्षक का संबंध चाहे निहित हो ही, परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि व्यवहार में यह एक मालिक तथा नौकर का ही संबंध रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, यह तीनों वर्ण यद्यपि अपने परस्पर संबंधों से संतुष्ट न भी हों, परंतु उन्होंने आपस में समझौता कर लिया है, ब्राह्मणों ने क्षत्रिय की स्तुति की और दोनों ने वैश्य को भी संतोष से जीने दिया, ताकि वे उस पर निर्भर होकर अपना जीवन व्यतीत कर सके। लेकिन तीनों शूद्र का दमन करने की बात पर सहमत थे। उसे संपत्ति प्राप्त करने की अनुमति नहीं दी गई, ताकि वह इन तीनों वर्णों से मुक्त न हो सके। उसे ज्ञान अर्जित करने से मना किया गया, ताकि वह अपने हितों की रक्षा करने हेतु निरंतर सतर्क न रहे सके। उसे शस्त्र-धारण करने की मनाई की गई, ताकि वह इन तीनों वर्णों के प्रभुत्व के विरुद्ध विद्रोह न कर सके। शूद्रों के साथ इन तीनों वर्गों ने कैसा व्यवहार किया, यह बात हमें मनु के इस विधान से स्पष्ट हो जाती है। सामाजिक अधिकारों से संबंधित मनु के विधि-नियमों से अधिक कुख्यात अन्य दूसरी विधि-नियमावली नहीं है। किसी स्थान का कोई भी सामाजिक अन्याय का उदाहरण उसके सामने फीका पड़ जाएगा। जिन सामाजिक बुराइयों के तहत उन पर अत्यचार किए गए, उन्हें अनगिनत लोगों ने क्यों सहन किया? दुनिया के दूसरे देशों में सामाजिक क्रांतियां हो गईं, भारत में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हो सकी, इस प्रश्न से मैं निरंतर चिंतित रहता हूं। इस प्रश्न