1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 97

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का मैं केवल एक ही उत्तर दे सकता हूं वह यह है कि चातुर्वर्ण्य की इस व्यवस्था ने हिंदू समाज के निचले स्तर के लोगों को किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष वृत्ति के लिए पूर्णरूप से अयोग्य बना दिया है। वे शस्त्र धारण नहीं कर सकते और बगैर शस्त्र के विद्रोह नहीं कर सकते। वे सभी हल चलाने वाले लोग थे अथवा हम ऐसा कह सकते हैं कि उन्हें हल चलाने को मजबूर किया गया और उन्हें अपने हल को तलबार में बदलने की अनुमति नहीं थी। उनके पास संगीनें नहीं थीं और इसलिए उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अपने हल पर बैठे रहने के अलावा कुछ कर नहीं सकता था। चातुर्वर्ण्य के कारण उन्हें शिक्षा प्रापत नहीं हो सकी। अपनी मुक्ति के बारे में न तो वे कुछ सोच सकते थे और न ही उन्हें कोई जानकारी थी। उन्हें निम्न बनकर रहने के लिए मजबूर किया गया और उससे मुक्ति का मार्ग ज्ञात न होने के कारण तथा मुक्ति का कोई साधन न होने के कारण वे अपनी स्थायी गुलामी से संतुष्ट हो गए और इसे उन्होंने अपनी नियति मान लिया, जिससे वे अलग नहीं हो सकते। यह सच है कि बलवानों ने यूरोप में भी स्वयं को शोषण करने से नहीं रोका_ उन्होंने कमजोर लोगों का शोषण किया, परंतु यूरोप में बलवान लोगों ने दुर्बल लोगों का इतने निर्लज्ज रूप से अपने शोषण के विरुद्ध असहाय नहीं बनाया, जितना कि भारत के हिंदुओं के मामले में देखने को मिलता है। बलवान और दुर्बल लोगों में सामाजिक संघर्ष यूरोप में भारत की तुलना में अधिक तीव्रता से चले हैं और वहां दुर्बल लोगों को सैनिक व्यवसाय में शस्त्र धारण करने की अनुमति है, उन्हें वोट देने का राजनीतिक अधिकार है, तथा शिक्षा के कारण नैतिक अधिकार भी है। यूरोप में बलवानों ने दुर्बल वर्गों से उनकी मुक्ति के यह तीन अधिकार कभी नहीं छीने। तथापि, चातुर्वर्ण्य के कारण भारत में जनता से यह तीनों अधिकार भी छीन लिए गए हैं। तब चातुर्वर्ण्य से और अधिक नीच सामाजिक संगठन की व्यवस्था कौन-सी है जो लोगों को किसी भी कल्याणकारी कार्य करने के लिए निर्जीव तथा विकलांग बना देती है। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इतिहास में इस संबंध में भरपूर प्रमाण उपलब्ध हैं। भारतीय इतिहास में एकमात्र ऐसा समय, जो कि स्वतंत्रता वह महानता तथा वैभव का प्रतीक कहा जाता था, वह मौर्य साम्राज्य-काल था। अन्य सभी अवधियों में देश को पराभाव तथा अंधकार से गुजरना पड़ा, परंतु मौर्य कालखंड एक ऐसा कालखंड था, जिसमें चातुर्वर्ण्य पूर्ण रूप से निर्मल हो गया था, जब शूद्र जन, जो कि प्रजा का एक मुख्य भाग थे, आत्मनिर्भर हो गए थे और देश के शासक बन गए थे। वह काल जब चातुर्वर्ण्य के फलने-फूलने पर देश के लोगों के एक बड़े समूह को लाचार जीवन व्यतीत करना पड़ा, पराभाव तथा अंधकार का समय है।

जाति के कारण परिवर्तनशीलता रुक जाती है। कभी-कभी ऐसा समय भी आता है, जब समाज को किसी संकटकालीन स्थिति से अपने-आपको बचाने के लिए अपने सभी साधन एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर ले जाना अनिवार्य हो जाता है। उदाहरण