1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 98

हिंदुत्व का दर्शन

83

के लिए, जब युद्ध के समान संकट आते हैं, तब समाज के लिए अपने सभी साधन सैनिक कार्रवाई के लिए स्थानांतरित करना आवश्यक हो जाता है। प्रत्येक का युद्ध में लड़ना आवश्यक होता है। प्रत्येक व्यक्ति सैनिक होना चाहिए, लेकिन क्या जाति से सिद्धांत के अंतर्गत यह संभव हो सकता है? स्पष्ट है कि ऐसा नहीं है। भारतीय इतिहास में पराभाव की जो एक परंपरा बनी हुई है, उसके लिए जाति-व्यवस्था ही जिम्मेदार है। जाति-व्यवस्था सर्वसाधारण की गतिशीलता रोक देती है, अथवा केवल क्षत्रिय ही युद्ध में लड़ें, ऐसी अपेक्षा की जाती थी। शेष, ब्राह्मण तथा वैश्य लोगों ने शस्त्र धारण नहीं किए थे और शूद्र, जो कि देश का एक बहुत ही बड़ा हिस्सा था, वे शस्त्र धारण कर ही नहीं सकते थे। इसका नतीजा यही होना था कि जब क्षत्रियों का एक छोटा-सा वर्ग किसी विदेशी शत्रु द्वारा पराजित हो जाए, तब संपूर्ण देश उस शत्रु के चरणों में चला जाए। यहां तक कि वह किसी भी प्रकार के प्रतिकार के योग्य भी नहीं रहता। भारतीय युद्ध अधिकतर केवल अकेले युद्ध अथवा संघर्ष होते थे। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि तब एक बार क्षत्रिय हार खा जाते, सभी कुछ समाप्त हो जाता। आखिर ऐसा क्यों? इस बात का सीधा उत्तर यही है कि समाज में सर्वसाधारण की गतिशीलता को मान्यता नहीं दी गई थी और जाति का यह सिद्धांत लोगों की मानसिकता में बहुत गहरा धंसा हुआ था।

यदि उपरोक्त निष्कर्ष सही है, तब ऐसे दर्शन या तत्वज्ञान को, जो समाज को अलग-अलग टुकड़ों में बांटता हो, जो कार्य की रुचि से अलग करता हो, जो मनुष्य के वास्तविक हितों के अधिकार को नष्ट करता हो और जो संकट के समय समाज को सुरक्षित करने के लिए अपने साधनों को गतिशील बनाने के मार्ग में रूकावटें पैदा करता हो, ऐसा दर्शन सामाजिक उपयोगिता की कसौटी पर सफल है, ऐसा कैसे कहा जा सकता है? इसलिए हिंदू धर्म का दर्शन न तो सामाजिक उपयोगिता की कसौटी पर, और न ही व्यक्तिगत न्याय की कसौटी पर खरा उतरता है।

V

मेरे विश्लेषण का निष्कर्ष इतना विचित्र है कि उससे अनेक लोगों को आश्चर्य हो सकता है। इससे आश्चर्यान्वित कुछ लोग तो ऐसा भी कह सकते हैं कि यदि मेरे निष्कर्ष इतने विचित्र हैं, तब हिंदू धर्म के दर्शन के मेरे इस विश्लेषण में कुछ-न-कुछ गलती अवश्य होगी। मुझे उनकी इस आपत्ति का उत्तर देना ही होगा। जो लोग मेरे इस विश्लेषण को स्वीकार करने से इंकार करते हैं, उनके लिए मैं यहीं कहना चाहूंगा कि उन लोगों को मेरा विश्लेषण इसलिए विचित्र लगता है, क्योंकि उन लोगों की हिंदू धर्म के दर्शन के संबंध में धारणाएं सही नहीं हैं। यदि वे सही धारणाएं रखते हैं, तब मेरे निष्कर्षों पर उन्हें आश्चर्य नहीं होगा।