1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 99

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह बात इतनी महत्वपूर्ण है कि उसे स्पष्ट करने के लिए मुझे यहीं पर रुक जाना चाहिए। इस बात को ध्यान रखना होगा कि इसके पूर्व मैंने धार्मिक क्रांति का जो विश्लेषण किया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि मानवीय समाज के दैवी प्रशासन के रूप में धार्मिक आदर्शों के दो प्रकार होते हैं - वह एक, जिसमें समाज उसका केंद्र बिंदु है और दूसरा वह, जिसमें व्यक्ति केंद्र बिंदु है। इसी विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि पहले प्रकार के आदर्शों में, क्या अच्छा है तथा क्या सही है। उदाहरणार्थ नैतिक व्यवस्था की कसौटी उपयोगिता है, जब कि दूसरे प्रकार के आदर्श में कसौटी न्याय है। अब हिंदू धर्म का दर्शन न तो उपयोगिता की कसौटी का और न न्याय की कसौटी का बत्तर दे सकता है। इसका कारण यह है कि हिंदू धर्म में मानव समाज के दैवी प्रशसन का धार्मिक आदर्श एक ऐसा आदर्श है, जो स्वयं एक अलग वर्ग के अंतर्गत आता है यह ऐसा आदर्श जिसमें व्यक्ति केंद्र की परिधि में नहीं है। आदर्श का केंद्र बिंदु न तो एक व्यक्ति है और न ही समाज। उसका केंद्र बिंदु एक विशिष्ट वर्ग महामानवों का वर्ग है, जिन्हें ब्राह्मण कहा जाता है। जो लोग इस महत्वपूर्ण परंतु विध्वंसक सच्चाई को ध्यान में रखेंगे, वे इस बात को समझ सकते हैं कि हिंदू धर्म के दर्पण की प्रतिस्थापना व्यक्तिगत न्याय अथवा सामाजिक उपयोगिता पर क्यों नहीं है? हिंदु धर्म के दर्शन की स्थापना संपूर्ण रूप से एक अलग तत्व के आधार पर की गई है। क्या योग्य है अथवा क्या उत्तम है, इस प्रश्न का हिंदू धर्म में एक विचित्र उत्तर मिलता है इसके अनुसार योग्य अथवा उत्तम कार्य वही है जो इन महामानवों के वर्ग, यानी ब्राह्मणों के हितों की रक्षा करता है। ऑस्कर वाइल्ड ने कहा है कि सुबोध होने का मतलब है, पहचाना जाना, मनु को कोई समझे इस बात का उसे न भय है, न शर्मिदगी। मनु इस बात का अवसर ही नहीं देता कि उसे कोई उसे खोज। वह अपने विचार मुखर एवं भव्य मंत्रों में व्यक्त करता है कि कौन महामानव है और कोई भी बात, जो इन महामानवों के हितों की रक्षा करती हो, उसे ही योग्य तथा उत्तम कहा जाए। मैं मनु के कुछ वक्तव्यों का उल्लेख करना चाहूंगा µ

10.3 जाति की विशिष्टता से, उत्पत्ति-स्थान की अध्ययन, अध्यापन एवं

व्याख्यान आदि द्वारा नियम के धारण करने से और यज्ञोपवीत संस्कार आदि

की श्रेष्ठता से ब्राह्मण की सब वर्णों का स्वामी है।

मनु अपने इस वक्तव्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए आगे कजता हैः

1.93 ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण ज्येष्ठ होने से और वेद के

धारण करने के धर्मानुसार ब्राह्मण ही सृष्टि का स्वामी होता है।

1.94 स्वयंभू इस ब्रह्मा ने हव्य तथा काव्य को पहुंचाने के लिए और

संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए तपस्या कर सर्वप्रथम ब्राह्मण को ही अपने

मुख से उत्पन्न किया।