सुधारक और उनकी नियति
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और 15. ‘ठीक ऐसे ही, लोहिक्क, जो यह कहता हैः ‘मान लो, कोई श्रमण अथवा ब्राह्मण किसी उच्च स्थिति (मस्तिष्क की) को प्राप्त कर लेता है, तो क्या उसे उसके बारे में किसी और को नहीं बताना चाहिए? क्योंकि कोई मनुष्य दूसरे के लिए क्या कर सकता है? दूसरों को बताना तो ऐसा ही होगा, मानो कि कोई मनुष्य एक पुराने बंधन को तोड़कर स्वयं को नए बंधन में फंसा ले।’ उसी प्रकार मैं कहता हूं कि दूसरों को बताने की यह इच्छा एक तरह की लालसा है। जो इस प्रकार बात करता है, वह उन परिजनों के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करेगा, जिन्होंने उस व्यक्ति द्वारा निर्धारित सिद्धांत और अनुशासन अंगीकार किए हैं, जिन्होंने सत्य पर विजय प्राप्त कर ली हैµउदाहरण के तौर पर धर्मान्तरण का फल प्राप्त कर चुके हैं, अथवा एक बार उसमें वापस जाने, अथवा कभी वापस न जाने, और यहां तक कि अर्हत के रूप में दीक्षित हो जाने की स्थिति में पहुंच चुके हैं, वह उनके मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करेगा, जो ऐसे आचरण को फलित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्वर्ग में परमेश्वर्य की स्थितियों में पुनर्जन्म संभव है। किंतु उनके मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करके उनकी भलाई के प्रति उसकी सहानुभूति नहीं होगी, उनकी भलाई के प्रति सहानुभूति के अभाव में उसका हृदय शत्रुता में निमग्न हो जाएगा, जो कि अविश्वसनीय सिद्धांत है। अब, लोहिक्क, अगर कोई मनुष्य अविश्वसनीय सिद्धांत को मानता है, तो मैं घोषणा करता हूं कि उसकी स्थिति यह होगी कि दो भावी जन्मों में एक बार वह या तो पाप-मोचन के लिए जन्म लेगा अथवा एक पशु के रूप में उसका जन्म होगा।
‘लोहिक्क, विश्व में ये तीन प्रकार के गुरु हैं, जो दोषारोपण के योग्य हैं, और जो भी इस प्रकार के गुरु को दोषी बताएगा, भर्त्सना न्यायोचित होगी, तथ्यों और सत्य के अनुरूप, अनुचित नहीं होगी। यह तीन प्रकार क्या हैं?
सर्वप्रथम, लोहिक्क, एक इस प्रकार का गुरु होता है, जो श्रमण के उस लक्ष्य
को प्राप्त नहीं कर सका है, जिसके कारण उसने गृह-त्याग किया और गृहविहीन
जीवन अंगीकार किया। उस लक्ष्य को स्वयं प्राप्त किए बिना वह अपने श्रोताओं को
सिद्धांत (धम्म) का उपदेश देता है और कहता हैः ‘यह तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है,
इससे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी।’ तब उसके वे श्रोता न तो उसे सुनते हैं, न उसके
शब्दों की ओर ध्यान देते हैं, और न उसके ज्ञान के माध्यम से चित्त को स्थिर
कर पाते हैं, वे अपने गुरु की शिक्षा से अलग, अपने ही मार्ग पर चलते हैं। इस
प्रकार के गुरु की भर्त्सना की जानी चाहिए, और उसे इन तथ्यों की जानकारी
कराते हुए यह भी बताना चाहिएः ‘तुम उस पुरुष की तरह हो, जो ऐसी स्त्री से
प्रणय निवेदन करेगा, जो कि उसका तिरस्कार करती है, अथवा उसका आलिंगन
करेगा जो उससे अपना मुख फेर लेती है।’ मैं कहता हूं, तुम्हारा यह लोभ भी
उसी प्रकार का है (मनुष्यों के गुरु का ढोंग रचते रहना, जब कि कोई ध्यान
नहीं देता, वे तुम्हारा विश्वास ही नहीं करते)। तब किस लिए, कोई मनुष्य दूसरे
के लिए कुछ करे?