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बौद्ध धर्म की अवनति तथा पतन

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की 300 वर्ष की इस अवधि के दौरान सारे भारत पर ऐसे राजाओं का शासन था, जो ब्राह्मण धर्म के रूढि़वादी व सनातन मत को मानते थे। मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा आहत ब्राह्मण धर्म सहायता तथा समर्थन के लिए शासकों की ओर देख सकता था और वह मिला भी। मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा पराजित तथा आहत बौद्ध धर्म के पास ऐसी कोई आशा की किरण नहीं थी। वह अनाथ बन चुका था। उसका कोई संरक्षक नहीं था। वह देशी शासकों की उपेक्षा के शीत झोंकों में मुरझा गया और विजेताओं द्वारा आक्रमणों की प्रज्ज्वलित अग्नि में जलकर नष्ट हो गया।

मुसलमान आक्रमणकारियों ने जिन बौद्ध विश्वविद्यालयों को लूटा, इनमें कुछ नाम नालंदा, विक्रमशिला, जगद्दल, ओदंतपूरी के विश्वविद्यालय हैं। उन्होंने बौद्ध मठों को भी तहस-नहस कर दिया, जो सारे देश में स्थित थे। हजारों की संख्या में भिक्षु भारत से बाहर भागकर नेपाल, तिब्बत और कई स्थानों में चले गए। मुसलमान सेनापतियों ने बहुत बड़ी संख्या में भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। बौद्ध भिक्षुओं को मुसलमान आक्रमणकारियों ने अपनी तलवार से किस प्रकार नष्ट किया, उसका वर्णन स्वयं मुस्लिम इतिहासकारों ने किया है। मुसलमान सेनापति ने बिहार में सन् 1197 में अपने आक्रमण के दौरान बौद्ध भिक्षुओं की किस प्रकार हत्याएं कीं, इसका संक्षिप्त वर्णन करते हुए विन्सेंट स्मिथ लिखते हैंः ख्1,

फ्बार-बार लूटमार और आक्रमणों के कारण बिहार में जिस मुसलमान

सेनापति का नाम पहले ही आंतक बन चुका था, उसने एक झटके में ही यहां

राजधानी पर कब्जा कर लिया। लगभग उन्हीं दिनों एक इतिहासकार की भेंट

सन् 1243 में आक्रमण करने वाले दल के एक व्यक्ति से हुई। उससे उसको

यह पता चला था कि बिहार के किले पर केवल दो सौ घुड़सवारों ने बेखटके,

निधड़क होकर पिछले द्वार से धावा बोला और उस स्थान पर अधिकार कर

लिया था। उन्हें लूट में भारी मात्रा में माल मिला और ‘सिरमुंडे ब्राह्मणों’

अर्थात बौद्ध भिक्षुओं की इस प्रकार से हत्या करके उनका सफाया कर

दिया था कि जब विजेता ने मठों व विहारों के पुस्तकालयों में पुस्तकों की

विषय-वस्तु को समझाने व स्पष्ट करने के लिए किसी योग्य व सक्षम व्यक्ति

की तलाश की, तो ऐसा कोई भी जीवित व्यक्ति नहीं मिला जो उनको पढ़

सकता। हमें यह बताया गया कि बाद में यह पता चला था कि समूचा दुर्ग

तथा नगर एक महाविद्यालय (कॉलिज) था। हिंदी भाषा में महाविद्यालय को

वे विहार कहते थे।य्

  1. अर्ली हिस्ट्री आफ इंडिया (1924), पृ. 419-20