96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस प्रकार बौद्ध पुजारियों का मुसलमान आक्रमणकारियों द्वारा संहार किया गया। उन्होंने जड़ पर ही कुल्हाड़ी मारी। धम्मोपदेष्टा की हत्या कर इस्लाम ने बौद्ध धर्म की ही हत्या कर दी। यह एक घोर संकट था, जो भारत में बौद्ध धर्म के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। किसी अन्य विचारधारा की भांति धर्म की स्थापना केवल प्रचार द्वारा ही की जा सकती है। यदि प्रचार असफल हो जाए तो धर्म भी लुप्त हो जाता है। पुजारी वर्ग, वह चाहे जितना भी घृणास्पद हो, धर्म के प्रवर्तन के लिए आवश्यक होता है। धर्म-प्रचार के आधार पर ही रह सकता है। पुजारियों के बिना धर्म लुप्त हो जाता है। इस्लाम की तलवार ने पुजारियों पर भारी आघात किया। इससे वह या तो नष्ट हो गया या भारत के बाहर चला गया। बौद्ध धर्म के दीपक को प्रज्ज्वलित रखने के लिए कोई भी जीवित नहीं बचा।
कहा जा सकता है कि वही बात ब्राह्मणवादी पौरोहित्य के संबंध में भी हुई होगी। ऐसा होना संभव है, भले ही उस सीमा तक नहीं हो। परंतु यह अंतर इन दोनों धर्मों के संगठन में रहा और यह अंतर इतना बड़ा है कि इसी कारण ब्राह्मण धर्म तो मुसलमानों के आक्रमण के बाद भी बचा रहा, परंतु बौद्ध धर्म नहीं बच सका। ये अंतर पुरोहित वर्ग से संबंधित है। ब्राह्मणवादी पौरोहित्य का एक बहुत ही विस्तृत व व्यापक संगठन रहा है। इसका स्पष्ट किंतु संक्षिप्त विवरण स्वर्गीय सर रामकृष्ण भंडारकर ने (इंडियन एंटिक्वैरी) में दिया है। ख्1, उन्होंने लिखा हैः
‘प्रत्येक ब्राह्मण परिवार में किसी न किसी वेद या वेद की एक विशेष
शाखा का नियमपूर्वक वास होता है और उस परिवार के घरेलू संस्कार उस
वेद से संबंधित सूत्र में वर्णित विधि के अनुसार संपन्न किए जाते हैं। उसके
लिए उस विशेष वेद की ऋचाओं को कंठस्थ करना अनिवार्य होता है। उत्तरी
भारत में मुख्यतः शुक्ल यजुर्वेद की प्रधानता है। यहां की शाखा मध्यंदिन
है। लेकिन इसका पाठ आदि लगभग समाप्त हो चुका है। अब यह केवल
बनारस में ही रह गया है। यहां पर भारत के सभी भागों से आकर ब्राह्मण
परिवार बस गए हैं। कुछ सीमा तक यह पद्धति गुजरात में प्रचलित है। परंतु
ये उससे अधिक महाराष्ट्र में प्रचलित है और तेलंगाना में बहुत बड़ी संख्या
में ऐसे ब्राह्मण हैं, जो आज भी इसके अध्ययन में लगे हुए हैं। इनमें से
बहुत से ब्राह्मण देश के सभी भागों में दक्षिणा (शुल्क-भिक्षा) लेने के लिए
जाते हैं और देश के खाते-पीते संपन्न लोग अपने साधनों के अनुसार उनको
सहायता प्रदान करते हैं। वे उनसे अपने से संबंधित वेद के अंशों को सुनते
हैं। यह अधिकांशतः कृष्ण यजुर्वेद और सूत्र आपष्तम्ब होता है। वहां बंबई
में कोई भी सप्ताह ऐसा नहीं जाता जब तेलंगाना से कोई ब्राह्मण मेरे पास
- इंडियन एंटिक्वैरी (1874), पृ. 132, मैक्स मूलर द्वारा उद्धृत हिब्बर्ट लेक्चर्स (1878), पृ. 162-66