बौद्ध धर्म की अवनति तथा पतन
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दक्षिणा मांगने के लिए न आता हो। प्रत्येक अवसर पर मैं उन लोगों से जो
कुछ उन्होंने पढ़ा है, उसका पाठ सुनता हूं और अपने पास रखे मुद्रित मूल
पाठ के साथ उसका मिलान व तुलना करता हूं।’
‘अपने व्यवसाय के अनुसार प्रत्येक वेद के ब्राह्मण सामान्यतः दो वर्गों में
विभक्त हैंµगृहस्थ और भिक्षु। गृहस्थ स्वयं सांसारिक व्यवसाय में लगे रहते हैं,
जब कि भिक्षु इन पवित्र पुस्तकों व गं्रथों के अध्ययन में तथा धार्मिक अनुष्ठान
करने में अपना समय व्यतीत करते है।’
‘इन दोनों वर्गों के लोगों को प्रतिदिन संध्या-वंदन अथवा सुबह-शाम प्रार्थना
करनी होती है, इनके रूप विभिन्न वेदों के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। परंतु
‘तत्सवितुर्वरेण्यम् गायत्री मंत्र’ का पाठ पांच बार, फिर अट्ठाईस बार या एक
सौ आठ बार करना सबके लिए सामान्य बात है, यह पाठ प्रत्येक धर्मानुष्ठान
का मुख्य अंग होता है।’
‘इसके अलावा, बहुत से ब्राह्मण प्रतिदिन एक अनुष्ठान करते हैं, जिसे
ब्रह्मयज्ञ कहते हैं। यह कुछ अवसरों पर सबके लिए आवश्यक होता है। यह
ऋग्वेद के लिए होता है। इसमें प्रथम मंडल का प्रथम स्त्रोत, ऐतरेय ब्राह्मण
का उपोद्घात, ऐतरेय आरण्यक के पांच मंडल, यजुः संहिता, साम-संहिता,
अथर्व-संहिता, आश्वलायन कल्प सूत्र, निरूक्त, खंड, निघंटु, ज्योतिष, शिक्षा,
पाणिनि, याज्ञवल्क्य स्मृति, महाभारत और कणाद, जैमिनि तथा बादरायण के
सूत्र समिलित होते हैं।’
यह बात याद रखने की है कि अनुष्ठान के मामले में भिक्षु ख्1, तथा गृहस्थ में कोई अंतर व भेद नहीं होता। ब्राह्मण धर्म में दोनों ही पुरोहित हैं और एक गृहस्थ एक पुरोहित के रूप में अनुष्ठान करने के लिए भिक्षु से किसी भी तरह से कम सुपात्र नहीं होता। यदि कोई गृहस्थ एक पुरोहित के रूप में अनुष्ठान का कार्य नहीं करता, तो इसका कारण यह होता है कि उसने मंत्रों तथा धर्मिक अनुष्ठानों में विशेषता प्राप्त नहीं की है या वह इसकी अपेक्षा कुछ और अधिक लाभप्रद व्यवसाय करता है। ब्राह्मण धर्म में प्रत्येक ब्राह्मण में जो बहिष्कृत नहीं है, पुरोहित होने की क्षमता होती है। भिक्खु वास्तविक पुरोहित होता है और गृहस्थ संभावित पुरोहित होता है। प्रत्येक ब्राह्मण पुरोहित
- भिक्षुओं का (ब्राह्मण धर्म में) आगे (1) वैदिक, (2) याज्ञिक, (3) श्रोत्रिय, तथा (4) अग्निहोत्री में
उप-विभाजन किया गया है। वैदिक वे होते हैं जो वेदों को कंठस्थ रखते हैं और उन्हें बिना किसी त्रुटि
के ठीक-ठीक सुना देते हैं। याज्ञिक वे होते हैं जो यज्ञ तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। श्रोतिय
वे हैं जो महान यज्ञ व बलि के अनुष्ठान करने की कला में पारंगत होते हैं। अग्निहोत्री वे हैं जो तीन
प्रकार की यज्ञाग्नि को दीप्त रखते हैं (इष्टि, पाक्षिक बलि) तथा चातुर्मास (प्रत्येक चार महीनों में किए
जाने वाले यज्ञ का अनुष्ठान) करते हैं।