98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बन सकता है। इसके अलावा, ब्राह्मण के लिए एक पुरोहित या पुजारी के रूप में कार्य के लिए कोई प्रशिक्षण या दीक्षा आवश्यक नहीं होती। पुरोहित या पुजारी का कार्य करने के लिए उसकी इच्छा ही पर्याप्त होती है। इस प्रकार ब्राह्मण धर्म में पौरोहित्य कर्म कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। प्रत्येक ब्राह्मण पुरोहित हो सकता है और उसे आवश्यकता पड़ने पर इस कार्य में प्रवृत्त किया जा सकता है, लम्पट से लम्पट व्यक्ति के जीवन तथा प्रगति को रोकने वाली को चीज नहीं है। बौद्ध धर्म में यह संभव नहीं है। उपासक या धर्मोपदेष्टा का कार्य करने से पहले उसे पहले से अभिषिक्त पुरोहितों द्वारा स्थापित संस्कारों के अनुसार अभिषिक्त किया जाना चाहिए। बौद्ध पुरोहितों के संहार के बाद यह अभिषेक असंभव हो गया था, जिससे बौद्ध धर्मोपदेष्टा का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। बौद्ध धर्मोपदेष्टा के अभाव को भरने के लिए प्रयास किया गया। सभी उपलब्ध स्रोतों से बौद्ध धर्मोपदेष्टा का वर्ग तैयार करना पड़ा। वे निश्चय ही सवोत्तम नहीं थे। हरप्रसाद शास्त्री ख्1, का मत हैः
फ्भिक्खु के अभाव से बौद्ध धर्मोपदेष्टा में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। विवाहित
पुरोहित वर्ग ने, जो परिवार वाला था और आर्य कहलाता था, मर्यादित भिक्षुओं
का स्थान ले लिया और उसने सामान्य रूप से बौद्धों के धार्मिक क्रियाकलापों
को संपन्न करना आरंभ कर दिया। उन्हें कुछ अनुष्ठान करने के बाद सामान्य
भिक्षुओं की प्रतिष्ठा दी जाने लगी (भूमिकाµपृष्ठ 19-7, तथाकर गुप्त की
पुस्तक आदि कर्म रचना 149, पृ. 1207-1208)। वे धार्मिक अनुष्ठान करते,
परंतु साथ ही राजगीर, रंगसाज, मूर्तिकार, सुनार तथा बढ़ई जैसे व्यवसाय करके
अपना जीविकोपार्जन करते। ये कारीगर व शिल्पकार पुरोहित जिनकी संख्या
बाद में पर्यादित भिक्खु की तुलना में काफी अधिक हो गई, लोगों के धार्मिक
मार्गदर्शक हो गए। अपने व्यवसाय के कारण उनके पास विद्या व ज्ञान प्राप्ति के
लिए, गंभीर मनन व विचार के लिए, तथा ध्यान करने एवं अन्य आध्यात्मिक
कार्यों के लिए बहुत कम समय बचता था और इसमें उनकी रुचि भी नहीं रही
थी। उनसे यह आशा नहीं की जा सकती थी कि वे अपने प्रयास से ह्रासोन्मुख
बौद्ध धर्म को कोई उच्चतर स्थिति प्रदान कर सकेंगे। उनसे यह आशा भी नहीं
की जा सकती थी कि वे तत्कालीन स्थिति में थोड़ा सुधार कर बौद्ध धर्म को
समाप्त होने से रोक सकते थे।य्
- नरेन्द्रनाथ लॉ द्वारा संक्षेप में प्रस्तुत विचार हरप्रसाद शास्त्री मैमोरियल खंड, पृ. 363-64