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बौद्ध धर्म की अवनति तथा पतन

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यह बात स्पष्ट है कि इन नए बौद्ध पुरोहित में न तो कोई गरिमा थी और न ही वे ज्ञानवान ही थे। ब्राह्मण पुरोहितों की तुलना में वे हीन थे, जो इनके प्रतिद्वंद्वी होते थे और जो विद्वान होते थे और उतने ही चतुर भी। ख्1,

ब्राह्मण धर्म विनाश के गर्त में डूबने से क्यों बच गया और बौद्ध धर्म क्यों नहीं बच सका, इसका कारण यह नहीं है कि बौद्ध धर्म की अपेक्षा ब्राह्मण धर्म में कोई श्रेष्ठता अंतर्निहित रही। इसका कारण उसके पुरोहितों का विशिष्ट चरित्र रहा। बौद्ध धर्म इसलिए समाप्त हुआ, क्योंकि उसके पुरोहितों का वर्ग ही नष्ट हो गया था और उसे फिर से जीवित करना संभव नहीं था। यद्यपि ब्राह्मण धर्म पराजित हो गया था, परंतु वह पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। प्रत्येक जीवित ब्राह्मण पुरोहित व पुजारी बन गया था और उसने अपने पूर्वज प्रत्येक ब्राह्मण पुरोहित का स्थान ग्रहण कर लिया था।

इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि बौद्ध धर्म के पतन का एक कारण, बौद्ध लोगों द्वारा इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लेना भी था।

प्रोफेसर सुरेन्द्रनाथ सेन ने भारतीय इतिहास कांगे्रस के प्रारंभिक मध्यकालीन तथा राजपूत अध्ययन खंड की गोष्ठी में, जो सन् 1938 में इलाहाबाद में हुई थी, अपने अध्यक्षीय भाषण में यह बात बहुत सटीक व सही कही थी कि भारत के मध्यकालीन इतिहास से संबंधित दो समस्याएं हैं, जिनका अभी तक कोई भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका है। उन्होंने दो समस्याओं का उल्लेख किया, पहली, राजपूतों की उत्पत्ति से संबंधित है। दूसरी, भारत में मुस्लिम जनसंख्या के विस्तार से संबंधित है। दूसरी समस्या के संबंध में उन्होंने कहाः

फ्परंतु मुझे एक प्रश्न पर विचार करने की अनुमति दी जाए, जो आज

पूर्णतया पुरातत्व विषयक रुचि का नहीं है। भारत में मुस्लिम जनसंख्या के

विस्तार के संबंध में कुछ स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। सामान्यतः यह

विश्वास किया जाता है कि इस्लाम का विस्तार उसकी विजय के साथ-साथ

हुआ और जिन लोगों को अधीनस्थ बनाया गया, उनको इस्लामी शासकों का

धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया था। जब हम सीमांत प्रांत तथा

  1. नए बौद्ध पुरोहित अपने-अपने व्यवसायों को क्यों नहीं छोड़ सके और अपने को पूर्णतया धर्म के प्रचार

में क्यों नहीं लगा सके, इसका कारण जैसा कि हरप्रसाद शास्त्री बताते हैं, यह हैः ‘बौद्ध धर्म को मानने

वाली जनता में कमी के कारण भी बौद्ध भिक्षुओं को भिक्षा प्राप्त करने में कठिनाई हुई। चूंकि एक

भिक्षु तीन से अधिक घरों में भिक्षा नहीं ले सकता था और उसी उद्देश्य से उसी घर में एक महीने के

अंदर नहीं जा सकता था, इसलिए एक भिक्षु को भिक्षा के लिए नब्बे घरों की आवश्यकता होती है।’

हरप्रसाद शास्त्री मैमोरियल खंड, पृ. 362