100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंजाब में मुसलमानों का आधिक्य व प्रधानता देखते हैं, तब इस विचार को बल
मिलता है। परंतु इस सिद्धांत के आधार पर पूर्वी बंगाल में मुसलमानों के भारी
बहुमत की बात समझ में नहीं आती। इस बात की संभावना हो सकती है कि
कुषाण के समय में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में तुर्क लोग बस गए थे और
उनका इस्लाम को आसानी से स्वीकार करना, नव विजेताओं के साथ उनके
जातीय भाईचारे या जातिगत संबंधों के कारण बताया जा सकता है। परंतु पूर्वी
बंगाल के मुसलमानों का तुर्की तथा अफगानों के साथ निश्चित रूप से कोई
जातीय संबंध नहीं है और उस क्षेत्र के हिंदुओं ने इस्लाम धर्म को किन्ही अन्य
कारणों से स्वीकार किया होगा। ख्1, य्
ये अन्य कारण क्या हैं? प्रो. सेन ने इन कारणों का उल्लेख किया है, जो मुस्लिम इतिहास ग्रंथों में भी मिलते हैं। वह सिंध का उदाहरण लेते हैं। इसके लिए प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध हैं। वह कहते हैंः ख्2,
फ्चचनामा के अनुसार सिंध के बौद्धों ने अपने ब्राह्मण शासकों के अधीन
सभी प्रकार के अपमान तथा निरादर सहे, और जब अरबों ने उनके देश पर
आक्रमण किया तो बौद्धों ने उनकी पूरे दिल से सहायता की। बाद में, जब
दाहिर का वध कर दिया गया और उसके देश में मुस्लिम शासन की दृढ़ता
से स्थापना हो गई, तो बौद्धों को यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि जहां तक
उनके अधिकारों, विशेषाधिकारों तथा सुविधाओं का संबंध है, अरब उनके लिए
यथास्थिति में कोई परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे, और यहां तक कि
नई व्यवस्था में भी हिंदुओं के साथ उत्तम व्यवहार किया गया। इस कठिनाई से
छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका इस्लाम धर्म को स्वीकार करना था, क्योंकि
धर्मपरिवर्तन करने वाले लोग शासक वर्ग के लिए आरक्षित सब विशेषाधिकार
व विशेष सुविधाओं के हकदार हो जाते थे। अतः सिंध के बौद्धों ने बहुत बड़ी
संख्या में इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया और वे मुसलमानों में शामिल
हो गए।य्
इसके बाद प्रो. सेन एक और महत्वपूर्ण बात कहते हैंः
फ्यह एक अप्रत्याशित घटना नहीं हो सकती कि पंजाब, कश्मीर, बिहार
शरीफ के आसपास के जिले, उत्तर-पूर्व बंगाल जहां पर मुसलमानों की अब
प्रधानता व बहुतायत है, मुसलमानों से पहले शक्तिशाली बौद्ध केंद्र थे। यह
कहना भी उचित नहीं होगा कि बौद्धों ने हिंदुओं की अपेक्षा राजनीतिक प्रलोभनों
अर्ली कैरियर ऑफ कान्हाजी आंगे्र एंड अदर पेपर्स, पृ. 188-89
वही, पृ. 188-89