104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कार्य नहीं होगा। एक बात मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं। उसका संबंध इस साहित्य के रचना-काल से है। हो सकता है, सभी इसे स्वीकार न करें कि यह साहित्य पुष्यमित्र की क्रांति के बाद की रचना है। इस तथ्य के विपरीत अधिकांश हिंदू, चाहे परंपरावादी हों या विरोधी, चाहे शिक्षित हों या अशिक्षित, इस बात में अटूट विश्वास रखते हैं कि उनका पवित्र साहित्य अति-प्राचीन है। अपने धार्मिक साहित्य को सबसे प्राचीन साहित्य मानना उनके लिए किसी धार्मिक सिद्धांत के मानने जैसा ही है।
मनु के काल-निर्धारण के प्रसंग में मैंने संदर्भ देते हुए बताया था कि मनुस्मृति की रचना ईसा पूर्व 185, अर्थात पुष्यमित्र की क्रांति के बाद सुमति भार्गव द्वारा की गई थी। इस विषय में मुझे अधिक कुछ नहीं कहना है।
भगवत्गीता के लेखन-काल के बारे में अनेक मतभेद हैं। श्री तेलंग के अनुसार गीता तीसरी सदी ईसवी पूर्व के पहले की रचना होनी चाहिए, किंतु कितने समय पहले, इस बारे में वह मौन हैं।
प्रो. गार्बे का कहना है ख्1, ः ‘गीता का वर्तमान स्वरूप उसके मूल स्वरूप से भिन्न है।’ अनेक भारतविद् भी अब यह मानने लगे हैं कि भगवत्गीता जिस रूप में आज उपलब्ध है, उसमें समय-समय पर अनेक मूलभूत रूपांतरण होते रहे हैं। प्रो. गार्बे बताते हैंः ‘गीता में एक सौ छियालीस श्लोक नए हैं।’ ये श्लोक मूल गीता में नहीं थे। उसके रचना-काल के बारे में प्रो. गार्बे ने कहा, ‘संभवतः इसे ईसा पूर्व दूसरी सदी से पहले की रचना नहीं माना जा सकता।’
प्रो. कोसांबी गीता को बालादित्य सम्राट के शासन-काल की रचना मानते हैं। बालादित्य गुप्त वंश का सम्राट था, जिसने आंध्र राजवंश सत्ताच्युत कर दिया था। वह सन् 467 में राजगद्दी पर बैठा। गीता को इतने बाद की रचना मानने के उन्होंने दो कारण बताए हैं। शंकराचार्य से पूर्व (जन्म 788-मृत्यु 820) उन्होंने भगवत्गीता की टिप्पणी लिखी, इससे पहले वह अज्ञात रचना थी। शांतरक्षित के तत्वसंग्रह में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता, जब कि यह ग्रंथ शंकराचार्य के आगमन के केवल पचास वर्ष पहले लिखा गया था। उन्होंने दूसरा कारण यह बताया है कि वसुबंधु ‘विज्ञानवाद’ नामक एक संप्रदाय का प्रणेता था। शंकराचार्य के ब्रह्म सूत्र भाष्य में इस विज्ञानवाद की आलोचना मिलती है। गीता ख्2, में एक जगह ब्रह्म सूत्र भाष्य का उल्लेख मिलता है। गीता को वसुबंधु और ब्रह्म सूत्र भाष्य के बाद की रचना माना जाना चाहिए। वसुबंधु गुप्तवंशीय नरेश बालादित्य
- प्रो. उटगीकर के अंगे्रजी अनुवाद ‘इंट्रोडक्शन टू दि भगवत्गीता’ में प्रो. गार्बे की भूमिका देखें।
- गीता, अध्याय 13, श्लोक 4