ब्राह्मण साहित्य
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का गुरु था। तद्नुसार यह माना जा सकता है कि गीता की रचना या तो बालादित्य के शासन-काल में हुई होगी या उसके बाद।
शंकराचार्य के काल-निर्धारण के बारे में इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उनके जीवन-काल और रचना-काल के बारे में अब सामान्यतः एक ही स्वीकार्य मत पाया जाता है। पर हां, उनकी जीवन संबंधी घटनाओं के बारे में अधिक शोध की आवश्यकता है। इस विषय पर मैं अन्यत्र अपने विचार प्रकट करूंगा। यहां बस इतना कहना ही पर्याप्त होगा।
महाभारत के रचना-काल का ठीक-ठीक निर्धारण करना लगभग असंभव है। इसके रचना-काल के निर्धारण के बारे में कुछ प्रयत्न किया जा सकता है। महाभारत के अब तक तीन संस्करण माने जा सकते हैं। प्रत्येक संपादक ने उसके नाम और कथावस्तु में भी परिवर्तन किया। अपने मूल रूप में यह ग्रंथ जय नाम से जाना जाता था। यह नाम तृतीय संस्करण के आरंभ और अंत, दोनों स्थानों में आया है। जय नामक यह मूल ग्रंथ किसी व्यास नाम के लेखक की रचना था। इसका दूसरा संस्करण भारत कहलाया। इसका संपादक कोई वैशम्पायन नाम का व्यक्ति था। वैशम्पायन का संस्करण भारत का अकेला द्वितीय संस्करण नहीं था। वैशम्पायन के अतिरिक्त व्यास के और भी कई शिष्य थे, जिनमें से प्रमुख चार थे सुमंतु, जैमिनि, पैल, और शुक। इन सभी ने व्यास से शिक्षा पाई थी। सभी ने भारत के अपने-अपने संस्करण तैयार किए। इस तरह तब भारत के चार और संस्करण तैयार हुए। वैशम्पायन ने इन चारों संस्करणों की पुनर्रचना कर अलग से अपना संस्करण तैयार किया। तीसरे संस्करण का संपादक सौति था। उसने वैशम्पायन के भारत को नया रूप प्रदान किया। सौति का यही संस्करण आगे चलकर महाभारत कहलाया। आकार और कथावस्तु, दोनों ही रूपों में यह संस्करण अपने पूर्ववर्ती संस्करण का विस्तार था। व्यास का जय काव्य एक लघु काव्य था, जिसमें 8,800 से अधिक श्लोक नहीं थे। वैशम्पायन के संस्करण में इस काव्य के श्लोकों की संख्या बढ़कर 24,000 हो गई। सौति के महाभारत में 96,836 श्लोक हैं। कथावस्तु की दृष्टि से व्यास के जय काव्य में केवल कौरवों और पांडवों के युद्ध की कथा थी। वैशम्पायन की कलम ने इस कथा सूत्र में नैतिक उपदेशों को पिरो दिया। इस तरह एक विशुद्ध ऐतिहासिक कृति रूपांतरित होकर एक उपदेश-प्रधान रचना बन गई, जिसका उद्देश्य सामाजिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों के नियम सिखाना था। सौति ने अंतिम संपादक के रूप में इस कृति को पौराणिक गाथाओं का एक विशाल भंडार बना दिया। भारत काव्य में जितनी भी प्रचलित दंतकथाएं या स्वतंत्र रूप से विख्यात जो भी ऐतिहासिक आख्यान थे, उन सबको सौति ने इस काव्य में सम्मिलित कर दिया, ताकि वे विस्मृत न हो जाएं अथवा कम से कम सभी एक स्थान पर मिल जाएं। सौति की एक अन्य आकांक्षा यह भी थी कि इस ग्रंथ को