ब्राह्मण साहित्य
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कुछ अन्य संदर्भों से भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। इसी अध्याय के 59वें श्लोक में कहा गया है कि ‘वृषलों के सताए हुए ब्राह्मण भय से पीडि़त हो हाहाकार करने लगेंगे और कोई रक्षक न मिलने के कारण सारी पृथ्वी पर निश्चय ही भटकते फिरेंगे।’
इस श्लोक में जिन वृषलों की ओर संकेत है, वे बौद्ध नहीं हो सकते। इस बात का लेशमात्र भी प्रमाण नहीं मिलता कि बौद्धों के हाथों ब्राह्मणों को कभी सताया गया हो। उलटे, इस बात के प्रमाण तो मिले हैं कि बौद्धों के शासन-काल में बौद्ध भिक्षुओं की ही तरह ब्राह्मणों के साथ भी उदारता का व्यवहार किया जाता था। यहां ‘वृषल’ से अर्थ है, असभ्य और ऐसा विशेषण मुसलमान आक्रांताओं के लिए ही प्रयुक्त हुआ लगता है।
वन पर्व के इसी अध्याय में अन्य श्लोक भी हैं। ये श्लोक हैंः 65, 66 और 67। इनमें कहा गया है कि ‘समाज अव्यवस्थित हो जाएगा। लोग एडूकों की पूजा करेंगे। वे देवों का बहिष्कार करेंगे। द्विजों की सेवा नहीं करेंगे। सारे संसार में एडूक व्याप्त हो जाएंगे। युग का अंत हो जाएगा।’
इस ‘एडूक’ शब्द का अर्थ क्या है? कुछ ने इसका अर्थ ‘बौद्ध चैत्य’ किया है। किंतु श्री कोसांबी के अनुसार यह ठीक नहीं है। ख्1, न तो बौद्ध साहित्य में, और न ही वैदिक साहित्य में, अर्थात कहीं भी ‘एडूक’ शब्द ‘चैत्य’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। उलटे अमरकोश और उसके व्याख्याकार महेश्वर भट्ट के अनुसार तो ‘एडूक’ का अर्थ ऐसी दीवार से है जिसे लकड़ी का ढांचा लगा कर पुष्ट किया गया हो। इस अर्थ को ध्यान में रखते हुए कोसांबी ने इस शब्द का अर्थ ‘ईदगाह’ लगाया है, जहां मुसलमान नमाज अदा करते हैं। यदि यह व्याख्या सही है, तो फिर स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि महाभारत के कुछ अंश मोहम्मद गौरी के आक्रमण के बाद लिखे गए थे। मुसलमानों का पहला आक्रमण इब्ने कासिम के नेतृत्व में सन् 712 में हुआ था। उसने उत्तरी भारत के कुछ नगरों पर कब्जा तो कर लिया था, किंतु उन्हें कोई बहुत नुकसान नहीं पहुंचाया। उसके बाद मौहम्मद गजनी ने हमला किया। उसने मंदिरों और विहारों को बुरी तरह से तोड़ा-फोड़ा और दोनों धर्मों के पुरोहितों का कत्लेआम किया। किंतु उसने भारत में मस्जिदें या ईदगाहें नहीं बनवाईं। ऐसा तो मौहम्मद गौरी ने किया। इससे यह साबित होता है कि महाभारत का लेखन सन् 1200 तक पूर्ण नहीं हुआ था।
ऐसा लगता है कि महाभारत की ही तरह रामायण के भी एक-एक कर तीन संस्करण तैयार हुए। महाभारत में रामायण के बारे में दो प्रकार के संदर्भ मिलते हैं। एक प्रसंग में
- हिंदू संस्कृति आणि अहिंसा, पृ. 156