112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पाने के लिए किसी तरह की व्यवस्था, किसी तरह के समन्वय की आवश्यकता थी। इसलिए जिज्ञासा संबंधी एक शाखा विकसित हुई, जिसे ‘मीमांसा’ कहते हैं। मीमांसा में वैदिक साहित्य के पाठ से संबंधित अर्थ पर विचार हुआ। जिन्होंने इस व्यवस्था, कार्य और समन्वय के काम को हाथ में लेना आवश्यक समझा, वे कर्मकांड को व्यवस्थित करने वाले, और ज्ञानकांड को व्यवस्थित करने वाले, इन दो संप्रदायों में बंट गए। परिणाम यह हुआ कि मीमांसा शास्त्र की दो शाखाएं विकसित हो गईं, जिनमें से एक पूर्व मीमांसा शाखा और दूसरी उत्तर मीमांसा शाखा कहलाई। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, पूर्व मीमांसा शाखा ने वैदिक साहित्य के आरंभिक अंश, अर्थात दो और ब्राह्मण ग्रंथों पर विचार किया। इसलिए यह पूर्व मीमांसा कहलाई। उत्तर मीमांसा शाखा ने वैदिक साहित्य के बाद वाले अंश, अर्थात आरण्यकों और उपनिषदों पर विचार किया, इसलिए यह उत्तर मीमांसा कही जाती है।
इन दोनों शाखाओं से संबंधित विपुल मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। इनमें से सूत्रों के दो संग्रह प्रमुख और अन्यतम मानने जाते हैं। पहला सूत्र संग्रह जैमिनि की रचना माना जाता है, जब कि दूसरा बादरायण का। जैमिनि के सूत्र-संग्रह में कर्मकांड ख्1, का विवेचन हुआ है जब कि बादरायण के सूत्र-संग्रह में ‘ज्ञानकांड’ का। निस्संदेह इन दोनों के पहले भी कुछ लेखकों ने इन्हीं विषयों पर व्याख्या लिखी थी। फिर भी, मीमांसा शास्त्र की दोनों शाखाओं में जैमिनि और बादरायण की कृतियां ही आदर्श ग्रंथ माने जाते हैं।
यद्यपि इन दोनों के सूत्र मीमांसा शास्त्र से संबंधित हैं, फिर भी जैमिनि के सूत्र मीमांसा सूत्र ख्2, कहलाते हैं, जब कि बादरायण के सूत्र वेदांत सूत्र। वेदांत का अर्थ है, वेद का अंत, अर्थात वेदों के अंतिम अध्याय में प्रतिपादित सिद्धांत। वेदों के अंतिम अध्याय से अर्थ है, उपनिषद और उपनिषदों को वेदों का अंतिम लक्ष्य माना जाता है। चूंकि बादरायण के सूत्रों ने इनके व्यवस्थापन और समन्वय का काम किया है, इसलिए इन सूत्रों का वेदांत सूत्र ख्3, कहते हैं। वेदों के अध्याय में प्रतिपादित इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार संजय को उक्त आदेश दिया गया था। वेदांत सूत्रों का यही उद्गम है।
वस्तुतः वैदिक साहित्य के कर्मकांड विषयक अंश के व्यवस्थापन से दो प्रकार की कृतियां तैयार हुईंः
कल्प सूत्र, और 2. पूर्व मीमांसा सूत्र। कल्प सूत्रों में ब्राह्मण ग्रंथों में विहित कर्मकांडों का संक्षिप्त
विवरण दिया गया है, जब कि पूर्व मीमांसा सूत्रों में उस सामान्य की व्याख्या और समर्थन किया गया
है, जिसका अनुसरण करना कल्प सूत्रकार के लिए आवश्यक है, बशर्ते कि वह अपने नियमों को वेदों
की शिक्षा के अनुरूप पूरी तरह व्याख्यातित करना चाहे।
इन्हें पूर्व मीमांसा अथवा कर्म मीमांसा भी कहते हैं।
इनके और भी नाम हैं, यथाµउत्तर मीमांसा सूत्र, ब्रह्म सूत्र या शारीरिक सूत्र या शारीरिक मीमांसा सूत्र।