6. ब्राह्मण साहित्य - Page 129

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की इन पांचों आचार्यों ने पांच अलग-अलग विचारधाराओं के अनुसार व्याख्या प्रस्तुत की। शंकर ने बताया कि वेदांत सूत्र परम अद्वैत की शिक्षा देते हैं, जब कि रामानुज के अनुसार विशिष्ट द्वैत की, निंबार्क के अनुसार द्वैताद्वैत की, माधव के अनुसार द्वैत की और वल्लभ के अनुसार शुद्ध द्वैत की। इन सभी पारिभाषिक शब्दों का क्या अर्थ है, यहां मैं इस पर विचार नहीं करूंगा। मैं तो केवल इतना भर बताना चाहता हूं कि एक ही सूत्र संग्रह की पांच अलग-अलग व्याख्याओं के परिणामस्वरूप पांच अलग-अलग संप्रदायों के उदय और विकास की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या यह केवल व्याकरण का विषय है? या इन विविध व्याख्याओं या टीकाओं के पीछे और कोई उद्देश्य छिपा है? इतने प्रकार की टीकाओं के कारण एक और प्रश्न उठता है। इन पांचों टीकाओं में आत्मा और परमात्मा को पहचानने के पांच रास्ते अपनाए गए हैं, जब कि वस्तुतः ये रास्ते दो ही हैं। एक रास्ता वह है जो शंकराचार्य ने अपनाया और दूसरा रास्ता वह है जिस पर शेष चारों आचार्य चले। यद्यपि चारों आचार्यों के बीच परस्पर मतभेद रहा, किंतु शंकराचार्य के विपक्ष में उनकी दो बातों को लेकर उनमें पूर्ण सहमति थीः 1. आत्मा और परमात्मा के बीच पूर्ण एकरूपता है, और 2. संसार माया है। यहीं तीसरा प्रश्न और उठता है। बादरायण के वेदांत सूत्रों की व्याख्या करते हुए शंकराचार्य ने अपना इतना अनदेखा मत क्यों प्रतिपादित किया? क्या उन्होंने सूत्रों का आलोचनात्मक विवेचन कर ऐसा किया? या क्या ऐसा करना उनके लिए अपने पूर्व विचारित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अभिलाषा कल्पित चिंतन मात्र था?

मैं केवल यह प्रश्न कर रहा हूं। यहां उसका उत्तर पाने के लिए विवेचन करना नहीं चाहता। मैं तो यहां केवल यह जानने का इच्छुक हूं कि यह साहित्य किस काल की रचना माना जाएµबौद्ध-काल के पूर्व की अथवा बौद्ध-काल के बाद की।

वेदांत सूत्र के रचना-काल को निर्धारित करने में आरंभिक कठिनाई यह सामने आती है कि भगवत्गीता की ही तरह इस ग्रंथ के पाठ में भी अनेक बार संशोधन होते रहे हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार ख्1, वेदांत सूत्र में तीन बार संशोधन हुए। इसी वजह से इसके निर्माण की सही-सही तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती। ख्2, जो विचार अब तक सामने आए हैं, वे केवल संभावित काल की ही सूचना देते हैं। निस्संदेह वेदांत सूत्र की रचना बुद्ध धर्म के जन्म के बाद ही हुई होगी, क्योंकि इन सूत्रों में स्पष्ट उल्लेख न होते हुए भी बौद्ध धर्म के बारे में संकेत अवश्य मिलते हैं। वेदांत सूत्रों की रचना मनु के बाद की नहीं मानी जा सकती, क्यों मनुस्मृति में वेदांत सूत्रों का उल्लेख मिलता है। प्रो. कीथ की मान्यता है कि इन सूत्रों की रचना सन् 200 के आस-पास हुई होगी। प्रो. जेकोबी कहते हैं कि इनकी रचना सन् 200 और सन् 450 के बीच हुई होगी।

  1. देखे बेलवल्कर, बसु मलिक लेक्चर्स ऑन वेदांत, लेक्चर 4

  2. देखें, राधाकृष्णन, इंडियन फिलोसफी, खंड 2, पृ. 430, जहां संबंधित साक्ष्य संकलित है।