6. ब्राह्मण साहित्य - Page 130

ब्राह्मण साहित्य

महाभारत

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महाभारत की रचना-तिथि का निर्धारण करना असंभव-सा है। हां, उसकी रचना के युग-निर्धारण का प्रयास अवश्य किया जा सकता है। महाभारत के तीन संस्करण हुए हैं और हर संस्करण के संपादक ने उसके शीर्षक और कथावस्तु, दोनों में परिवर्तन किए हैं। अपने मूल रूप में यह जय के नाम से जाना जाता था। यही मूल नाम तीसरे संस्करण के आरंभ और अंत, दोनों स्थानों में आया है। इस मूल रूप जय की रचना किसी व्यास ने की थी। इसका दूसरा संस्करण भारत कहलाया। भारत का संपादन वैशम्पायन ने किया था। भारत नामक इस काव्य का वैशम्पायन कृत द्वितीय संस्करण ही अकेला संस्करण नहीं था। व्यास के शिष्यों में वैशम्पायन के अतिरिक्त सुमंतु, जैमिनि, पैल और शुक भी थे। इन सभी ने व्यास से विद्या ग्रहण की थी। इन्होंने अपने-अपने संस्करण तैयार किए। इस प्रकार भारत के ही चार और संस्करण उपलब्ध थे। वैशम्पायन ने इन सभी को नए रूप में ढालकर अपना नया संस्करण तैयार किया। तीसरे संस्करण का संपादक सौति था। उसने वैशम्पायन के संस्करण को नए रूप में ढाला। सौति का संस्करण अंततोगत्वा महाभारत के नाम से जाना गया। यह संस्करण आकार और कथावस्तु, दोनों रूपों में अपने पूर्ववर्ती संस्करणों का परिवर्धित रूप था। व्यास के जय नामक लघु काव्य ग्रंथ में 8,800 से अधिक श्लोक नहीं थे। वैशम्पायन के भारत में यह संख्या बढ़कर 24,000 हो गई। सौति ने श्लोकों की संख्या में विस्तार किया और इस तरह महाभारत में श्लोकों की संख्या बढ़कर 96,836 हो गई। कथावस्तु के रूप में व्यास के मूल काव्य में केवल कौरवों और पांडवों की युद्ध कथा थी। वैशम्पायन के काव्य में कथावस्तु में दोगुनी वृद्धि हो गई। मूल युद्ध-कथा के साथ में उपदेश, अर्थात शिक्षाप्रद घटनाएं भी जुड़ गईं। इस तरह एक विशुद्ध ऐतिहासिक काव्य के स्थान पर इस कृति ने उपदेशात्मक रूप ग्रहण कर लिया, जिसका उद्देश्य सामाजिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों, अर्थात नित्य-नियमों की शिक्षा देना हो गया। अंतिम संपादक के रूप में सौति ने इस महाभारत को दंतकथाओं, आख्यानों, घटनाओं आदि का एक विशाल सर्वतोमुखी संग्रह बना दिया। भारत में वर्णित कथा के अतिरिक्त स्वतंत्र रूप से जितनी भी दंतकथाएं या ऐतिहासिक आख्यान प्रचलित थे, उन सबको सौति ने अपने ग्रंथ में समाविष्ट कर लिया, ताकि वे विस्मृत न हो जाएं अथवा कम से कम एक स्थान पर तो उपलब्ध हो जाएं। सौति की एक आकांक्षा यह भी थी कि भारत को शिक्षा और ज्ञान का अक्षय भंडार बना दिया जाए इसलिए उसने इसमें राजनीति, भूगोल, धनुर्विद्या आदि ज्ञान और शिक्षा की सभी शाखाओं से संबंधित सामग्री जोड़ दी। सौति पुनरावृत्ति का शौकीन था। इसे ध्यान में रखते हुए किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि यह कहा जाए कि उसके हाथों से निकलकर भारत, महाभारत बन गया।

अब तिथि निर्धारण के बारे में विचार करें। निस्संदेह कौरवों और पांडवों का युद्ध एक अत्यंत प्राचीन घटना थी। किंतु इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि व्यास की कृति