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ब्राह्मण साहित्य

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नहीं थी। परंपरागत मान्यता के अनुसार, और इस मान्यता में संदेह की गुंजाइश नहीं है, सबसे पहले केवल एक पुराण था। यह भी माना जाता है कि यह पुराण वेदों से भी पुराना था। अथर्ववेद में इस पुराण का उल्लेख है और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार यह वेदों से भी पुराना है। यह एक कथा थी, जिसे राजा को शतपथ के लिए जानना आवश्यक था। ब्राह्मण कहता है कि यज्ञ के दसवें दिन अध्वर्यु द्वारा इसे राजा को सुनाने का विधान रहा।

अट्ठारह पुराणों के जन्म की कथा व्यास से संबंधित है। कहते हैं कि व्यास ने ही उस मूल पुराण को काट-छांटकर, अर्थात उसे घटा-बढ़ाकर उससे ही अट्ठारह पुराण बना दिए। इस तरह इन अट्ठारह पुराणों के निर्माण की घटना को पुराणों के विकास का द्वि तीय चरण माना जा सकता है। इन अठारह पुराणों में से प्रत्येक पुराण के आरंभ के अंश को जिसे व्यास ने अभिव्यक्त या प्रकाशित किया, आदि पुराण ख्1, कहते हैं। मूल कथा व्यास द्वारा रचित है। जब व्यास इन अट्ठारह पुराणों की रचना कर चुके, तब उन्होंने इनको अपने शिष्य रोमहर्षण को सुनाया। रोमहर्षण द्वारा रचित पुराणों का तीसरा संस्करण बना है। रोमहर्षण के छह शिष्य थे। इनमें से तीन शिष्यों, कश्यप, सावर्णी और वैशम्पायन, ने भी अपने-अपने संस्करण तैयार किए, जिन्हें पुराणों का चौथा संस्करण कहा जा सकता है। ये तीनों संस्करण अलग-अलग इन्हीं तीनों के नाम से जाने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार पुराणों में संशोधन राजा विक्रमादित्य ख्2, के शासन-काल में हुआ।

अब पुराणों की कथावस्तु के बारे में विचार करें। प्राचीनकाल से ही पुराण ज्ञान की एक शाखा रहा है। इसे इतिहास से भिन्न माना गया है। इतिहास का अर्थ था किसी शासक राजा से संबंधित प्राचीन घटनाओं का वर्णन। आख्यान से तात्पर्य था, आंखों देखी घटनाओं का मौखिक रूप से कथन। इसी तरह उपाख्यान सुनी हुई कथा के पुनर्कथन को कहते थे। पूर्वजों, प्रकृति और ब्रह्मांड विषयक गीतों को गाथा कहा जाता था।

श्राद्ध और कल्प ख्3, विषयक प्राचीन कर्मकांडों को कल्पशुद्धि ख्4, कहते थे। ज्ञान की इन

  1. आदि पुराण का यह अर्थ नहीं है कि यह इस नाम से एक अलग पुराण है। इसका अर्थ प्रत्येक अट्ठारह

पुराणों के प्रथम संस्करण से है।

  1. विक्रमादित्य कौन है, यह कोई नहीं जानता।

  2. श्री हजारा (कल्प शुद्धि के बजाय) कल्प ज्योति कहते हैं, जिसका अर्थ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही

जनश्रुति से हैµदेखें, पुराण के कालतत्व, पृ. 4

  1. ‘कल्प’ शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है, जैसे, 1. व्यवहारिक, 2. उचित, और 3. योग्य, सक्षम।

अन्य स्थानों में इसका प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है जैसे, 1. धार्मिक नियम, 2. निर्धारित विकल्प,

  1. अनुष्ठान में निर्मित, 4. संसार का अंत, प्रलय, 5. ब्रह्म युग का एक दिन, 6. रोगी का उपचार, और

  2. छह वेदांगों में से एक, जिसमें अनुष्ठान तथा विभिन्न पर्व और यज्ञ-कर्म संपन्न करने की विधि

निर्धारित की गई है।