6. ब्राह्मण साहित्य - Page 135

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शाखाओं से पुराण भिन्न माने जाते थे। पुराण में ये पांच विषय होते थेः 1. सर्ग, 2. प्रति सर्ग, 3. वंश, 4. मन्वंतर, और 5. वंशचरित। सर्ग का अर्थ है ब्रह्मांड की रचना, प्रति सर्ग का अर्थ है ब्रह्मांड का विलय। वंश से तात्पर्य है जीवन का क्रम, अर्थात वंशावली। विभिन्न मनुओं के युगों को मन्वंतर कहते थे, विशेष रूप से उन चौदह मनुओं की परंपरा को जिनसे इस पृथ्वी पर सृष्टि का विकास हुआ माना जाता है। वंशचरित से तात्पर्य है, राजा-महाराजाओं की पीढि़यों का वर्णन।

पुराणों की विषय-वस्तु के क्षेत्र में पर्याप्त विस्तार हुआ लगता है क्योंकि आज पुराण जिन रूपों में मिलते हैं, उनमें उनकी विषय-वस्तु उपर्युक्त पांच विषयों तक ही सीमित नहीं है। उनमें इन पांच निर्धारित विषयों के अतिरिक्त भी अनेक नए विषय सम्मिलित हो गए हैं। वस्तुतः पुराणों के विषय-क्षेत्र की अवधारणा में ही इतना परिवर्तन हो गया है कि कुछ पुराणों में तो पूर्व-निर्धारित विषयों में से किसी का विवेचन मिलता ही नहीं, उलटे उनमें केवल नए अथवा अतिरिक्त विषयों का विवेचन ही हुआ है। इन अतिरिक्त विषयों में निम्नलिखित विषय सम्मिलित हैंः

  1. स्मृति धर्मµ(क) वर्णाश्रम धर्म, (ख) आचार, (ग) अहनिका, (घ)

भाष्याभाष्य, (घ) विवाह, (च) अशौच, (छ) श्राद्ध, (ज) द्रव्यशुद्धि,

(झ) पताका, (ट) प्रायश्चित, (ठ) नरक, (ड) कर्म विपाक, और (द)

युग-धर्म,

  1. व्रत धर्मµव्रत रखना, पर्व का पालन,

  2. क्षेत्र धर्मµतीर्थ यात्रा, और

  3. दान धर्मµदान-पुण्य करना।

इनके अतिरिक्त दो विषय और हैं, जिनके बारे में इन पुराणों में बहुत-कुछ कहा गया है।

पहला विषय किसी मत या पंथ विशेष की पूजा-आराधना से संबंधित है। हर पुराण का कोई न कोई इष्ट देवता है और वह पुराण उसी देवता की आराधना-पद्धति अपनाने और उसी देवता को अपना इष्ट बनाने पर बल देता है। अट्ठारह पुराणों में से पांच पुराण ख्1 , विष्णु की आराधना पर बल देते हैं। आठ ख्2, शिव पूजा पर, एक ख्3, ब्राह्मण की पूजा पर, एक ख्4, सूर्य की पूजा पर, दो देवी की पूजा पर और एक गणेश की पूजा पर।

  1. (1) विष्णु (2) भागवत् (3) नारद (4) वामन और (5) गरुड़

  2. (1) शिव, (2) ब्रह्म, (3) लिंग, (4) वराह, (5) स्कंद, (6) मत्स्य, (7) कर्म, और (8) ब्रह्मांड

  3. पद्म

  4. अग्नि