ब्राह्मण साहित्य
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पुराणों की कथा-वस्तु का दूसरा सर्वाधिक प्रिय विषय है, ईश्वर के अवतार। पुराणों में भगवान का वास्तविक स्वरूप क्या है, और ईश्वर ने कौन-कौन से अवतार धारण किए थे, इसमें भेद किया गया है। जहां तक ईश्वर के स्वरूप का प्रश्न है, पुराण कहते हैं कि ईश्वर की सत्ता तो एक ही है किंतु उसे दो नामों से जाना जाता है। पर जब ईश्वर मानव या पशु के रूप में अवतार लेता है, तो वह कुछ न कुछ चमत्कार अवश्य दिखाता है। अवतारवाद के बारे में जानने का सर्वाधिक उपयोगी स्त्रोत विष्णु पुराण है, क्योंकि केवल विष्णु ने ही समय-समय पर अवतार लेकर अनेक अलौकिक कार्य किए हैं। पुराणों में अवतारवाद के इसी विषय पर अत्यंत विस्तार से चर्चा मिलती है।
यदि यह कहा जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि इन्हीं नए विषयों के विस्तार से जुड़ जाने के कारण पुराणों के असली स्वरूप को पहचानना कठिन हो गया है।
पुराणों के वास्तविक रचयिता कौन थे, यह प्रश्न भी विचारणीय है, क्योंकि ऐसा लगता है कि रचयिताओं के नाम बदलते रहें हैं। प्राचीन हिंदुओं में साहित्य सृष्टाओं के दो अलग-अलग वर्ग थे। एक वर्ग ब्राह्मणों का था, तो दूसरा सूतों का। ये सूत ब्राह्मणेत्तर थे। दोनों वर्गों ने अलग-अलग प्रकार के साहित्य की रचना की। सूतों का एकाधिकार पुराणों पर था। इन पुराणों की रचना अथवा इनके कथा-वाचन से ब्राह्मणों का कोई संबंध नहीं था। यह केवल सूतों के लिए आरक्षित था और इससे ब्राह्मणों का कोई संबंध नहीं था। यद्यपि सूतों ने पुराणों की रचना और उनके वाचन का पैतृक अधिकार प्राप्त कर लिया था और यह कार्य उनके लिए निर्धारित हो गया था, किंतु एक समय ऐसा आया जब ब्राह्मणों ने सूतों के हाथ से यह व्यवसाय छीनकर उस पर अपना एकाधिकार जमा लिया। इस प्रकार पुराणों के रचयिता बदल गए। सूतों के स्थान पर अब ब्राह्मण थे जो इनके रचयिता हो गए। ख्1,
जब पुराणों पर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हो गया, तथा कदाचित इनके अंतिम संस्करण तैयार हुए और उनमें नए-नए विषय जोड़ दिए गए। नए-नए विषय जुड़ जाने से इनमें जो परिवर्धन-संशोधन हुए, वे अभूतपूर्व थे। ब्राह्मणों ने परंपरा से प्राप्त पुराणों कें अनेक नए अध्याय जोड़ दिए, पुराने अध्यायों को बदलकर नए अध्याय लिख दिए और पुराने नामों से ही अध्याय रच दिए। इस तरह इस प्रक्रिया से कुछ पुराणों की पहले वाली सामग्री ज्यों-की-त्यों रही, कुछ की पहले वाली सामग्री लुप्त हो गई, कुछ में नई सामग्री जुड़ गई तो कुछ नई रचनाओं में ही परिवर्तित हो गए।
पुराणों के रचना-काल का निर्धारण टेढ़ी खीर है। ब्राह्मणों ने जिन-जिन इतिहास ग्रंथों की रचना की, उनमें निर्माण-तिथि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। पुराण भी इसके अपवाद नहीं रहे। इसलिए पुराणों के रचना-काल का निर्धारण भी उन अन्य साक्ष्यों
- पार्टिजर