ब्राह्मण साहित्य
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हो सकता है पर इस बात की संभावना बहुत कम है कि इस अवधि में कोई आमूल परिवर्तन हो जाए, अर्थात शताब्दियों का अंतर आ जाए।
उपर्युक्त संक्षिप्त सर्वेक्षण से यह बात साफ हो जाती है कि पुराण साहित्य की रचना बुद्धेतर काल में हुई थी। सर्वेक्षण से एक और महत्वपूर्ण तथ्य सिद्ध होता है कि पुराण साहित्य पुष्यमित्र के नेतृत्व में ब्राह्मणों की विजय के बाद के काल में लिखा गया था। इस सर्वेक्षण से एक बात और सामने आती है, वह यह है कि व्यास ने ही महाभारत की रचना की, व्यास ने ही गीता रची और व्यास ने ही पुराण भी लिखे। महाभारत में अट्ठारह पर्व हैं, गीता में अठारह अध्याय हैं और पुराणों की संख्या भी अट्ठारह है। तो क्या यह संख्या संयोग मात्र है? या यह एक सुनियोजित, अर्थात सोची-समझी युक्ति या किसी विद्वत गोष्ठी में हुई सहमति का परिणाम? इसका उत्तर पाने के लिए हमें प्रतीक्षा करनी होगी।
III
वेदांत सूत्र
जैसा कि पहले बताया जा चुका है, बादरायण के वेदांत सूत्र जैमिनि के कर्म सूत्रों की ही तरह ज्ञान की एक विशेष शाखा है। सहज ही पूछा जा सकता है कि इन दोनों संप्रदायों के प्रणोताओं की एक-दूसरे की विचारधाराओं के बारे में क्या धारणा थी? जब इसके बारे में खोज-खबर लेने का हम प्रयत्न करते हैं, तो हमें बहुत ही आश्चर्यजनक तथ्य ज्ञात होते हैं। प्रो. बैलवल्कर ख्1, के शब्दों में एक तो यह कि ‘वेदांत सूत्रों की रचना पूरी तरह कर्म सूत्रों के अनुकरण पर ही हुई है।’ रचना-पद्धति और शब्दावली, दोनों ही दृष्टियों से जैमिनि ने जो नियम निर्धारित किए, उन्हें बादरायण ने ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया। पारिभाषिक शब्द और उनके आशय, दोनों में ही समान अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं। बादरायण ने वही दृष्टांत दिए हैं, जो जैमिनि ने दिए हैं।
यह समानता तो थोड़ी कम आश्चर्यकारी है। अधिक आश्चर्य तो तब होता है जब हम यह देखते हैं कि एक-दूसरे की विचारधाराओं के प्रति उनकी धारणाएं क्या थीं। मैं एक उदाहरण देता हूं।
बादरायण ने वेदांत के बारे में जैमिनि के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए निम्नलिखित सूत्र उद्धृत किए हैं ख्2, ः
बसु मलिक लेक्चर्स, पृ. 152
स्वामी वीरेश्वरानंदµब्रह्म सूत्र (अद्वैत आश्रम, संस्करण, 1936) पृ. 408-11