6. ब्राह्मण साहित्य - Page 145

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सबसे पहला प्रश्न है, यह कृष्ण कौन है? आश्चर्य है कि गीता में ही इस प्रश्न के अनेक प्रकार के उत्तर निहित हैं। गीता के आरंभ में कृष्ण एक सामान्य मानव के रूप में, अर्थात मानवीय व्यक्तित्व लिए उभरता है। वह योद्धा है। महान योद्धा होने के बावजूद वह अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार करता है। ख्1, अर्जुन का रथ चलाने जैसा तुच्छ समझा जाने वाला काम अपनाता है। मानव से वह अतिमानव बन जाता है जो युद्ध का संचालक और नियामक ही नहीं, अपितु उसका भविष्य-दृष्टा भी है। अतिमानव से उसका विकास, देवतुल्य मानव और अधिनायक के रूप में होता है। जब उसके सारे तर्क अर्जुन को युद्ध के लिए सन्नद्ध करने में असफल हो जाते हैं, तो वह सीधे तौर पर अर्जुन को युद्ध करने का आदेश देता है और इस तरह भय-ग्रस्त अर्जुन उठ खड़ा होता है और उसके कथनानुसार कार्य करने को तैयार हो जाता है। तब देवतुल्य मानव से उठकर वह ईश्वर का स्थान ग्रहण कर लेता है। इस प्रसंग में उसे ईश्वर ही कहा गया है।

उपर्युक्त विवरणानुसार कृष्ण के व्यक्तित्व का निरंतर विकास हुआ है किंतु इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसी गीता में कृष्ण को ईश्वर के अन्य रूपों का प्रतिनिधित्व करने वाला भी बताया गया है। यदि कोई व्यक्ति, चाहे संयोगवश ही गीता का पाठ क्यों न करे, उसे कृष्ण के इस प्रकार के चार प्रतिनिधि चरित्रों की अवश्य जानकारी मिल जायेगी। कृष्ण वासुदेव हैः

भगवत्गीता

10.37. वृष्णिकुल में मैं वासुदेव हूं, पांडवों में धनंजय मैं हूं, मुनियों में व्यास मैं

हूं, ऋषियों के लिए ऋषि उशना मैं हूं।

कृष्ण, विष्णु भगवान के अवतार हैं

10.12. आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं।

10.21. आदित्यों में विष्णु मैं हूं, ज्योतिष्कों में ज्योतिष्मान सूर्य मैं हूं, वायुओं में

मरीचि मैं हूं, तारापुंज में चंद्र मैं हूं।

11.24. आपको आकाश का स्पर्श करते, नाना वर्णों में जगमगाते, आपके मुख को

विशाल रूप से विवृत और आपके दीप्तमान विशाल नेत्रों को देखकर हे विष्णु, मेरा

हृदय व्याकुल हो उठा है और मैं धैर्य या शांति नहीं रख पा रहा हूं।

  1. यह घटना कृष्ण और कौरवों के नायक दुर्योधन के बीच हुए समझौते का परिणाम थी। युद्ध शुरू होने

से पहले एक बार कृष्ण दुर्योधन के पास पहुंचा और उसे कौरवों की ओर लड़ने के लिए आमंत्रित

किया। कृष्ण ने दुर्योधन के सामने विकल्प रखा, मुझे चाहते हो या मेरी यादव सेना को। दुर्योधन ने

यादव सेना को लेना स्वीकार किया। इसलिए कृष्ण और यादव सेना परस्पर दलों के साथ थे।