6. ब्राह्मण साहित्य - Page 146

ब्राह्मण साहित्य

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11.30. हे विष्णु! आप सब लोकों को सब ओर से निगलकर अपने धधकते हुए

मुख से उन्हें चाट रहे हैं। हे सर्वव्यापी विष्णु! आपका उग्र प्रकाश समूचे जगत को

तेज से पूरित कर रहा है और तपा रहा है।

कृष्ण शंकर के भी अवतार हैंः

10.23. रुद्रों में शंकर मैं हूं, यक्ष और राक्षसों में कुबेर मैं हूं, वसुओं में अग्नि मैं

हूं, पर्वतों में मेरु मैं हूं।

कृष्ण ब्रह्मा हैंः

15.15. मैं सबके हृदय में अधिष्ठित हूं। स्मृति, ज्ञान और उनका अभाव मेरे कारण

होता है। मैं वस्तुतः वह हूं जो समस्त वेदों जानने योग्य है। वेदांत का प्रणेता वस्तुतः

मैं हूं और वेदों का ज्ञाता भी मैं हूं।

15.16. इस लोक में दो पुरुष हैं। एक क्षर और दूसरा अक्षर है। सभी जीव क्षर हैं

और उनमें जो आत्मा है, वह अक्षर कहलाती है।

15.17. इसके सिवाय कुछ और है परम पुरुष, जो परमात्मा कहलाता है। अव्यय

ईश्वर जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पोषण करता है।

15.18. चूंकि मैं क्षर से परे हूं, इसलिए वेदों और लोकों में मैं पुरुषोतम नाम से

प्रख्यात हूं।

15.19. हे भरत के वंशज! जो मोह रहित होकर मुझे पुरुषोतम को इस प्रकार जानता

है, वह सब कुछ जानता है और मुझे पूर्ण भाव से भजता है।

अब अगला प्रश्न लें। कृष्ण ने अर्जुन को किस सिद्धांत का उपदेश दिया? कहा जाता है कि यह सिद्धांत मोक्ष का सिद्धांत है। यद्यपि कृष्ण ने जिस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, वह मोक्ष से संबंधित है किंतु कृष्ण ने तो मोक्ष के तीन अलग-अलग सिद्धांतों का उपदेश दिया है।

‘ज्ञानमार्ग’ से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है जिसका सांख्य योग ने प्रतिपादन किया है।

2.39. तुझे आत्मज्ञान के गुण के विषय में बताया गया, अब तू योग के विषय में

सुन। हे पार्थ, इसे सुनकर तू कर्म के बंधनों का नाश करेगा।

यह सांख्य योग पर उपदेश का अंतिम छंद है, जिसकी व्याख्या दूसरे अध्याय के

ग्यारहवें से सोलहवें और अट्ठाहरवें से तीसवें छंदों में की गई है।