6. ब्राह्मण साहित्य - Page 147

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. कर्म मार्ग से मोक्ष प्राप्त हो सकता हैः

5.2. कर्मों का त्याग और योग, दोनों ही मोक्ष देने वाले हैं, इनमें से कर्मों का योग कर्मों के संन्यास से बढ़कर है।

  1. भक्तिमार्ग से मोक्ष संभव हैः

9.13. लेकिन हे पार्थ, दैवी प्रकृति से मुक्त महात्माजन मुझे सब प्राणियों का कारण और अक्षर स्वरूप जानकर अनन्य मन से मुझे भजते हैं।

9.14. ये लोग मेरी सदा स्तुति करते तथा दृढ़ निश्चय से प्रयत्न करते, भक्तिपूर्वक मुझे प्रणाम करते, सदा संकल्प युक्त मुझे भजते हैं।

9.15. और अन्य लोग भी ज्ञान के यज्ञ के (अर्थात् सभी में आत्मा को देखते हुए, मुझे जो पूर्ण है, जो एक है, जो सबसे पृथक है, जो बहुगुण है, भजते हैं) 9.17. मैं इस जगत का पिता हूं, माता हूं, धाता और पितामह हूं, गेय हूं, ओउम हूं और ऋक्, साम तथा यजुर्वेद हूं।

11.22. जो लोग मुझे अनन्य समझ मेरा ध्यान करते हैं, सभी प्राणियों में भजते हैंः, उनके लिए इस प्रकार मैं सदा उस वस्तु का वहन करता हूं जिसका उनमें अभाव है, मैं उस चीज की रक्षा करता हूं जो उनके पास है।

भगवत्गीता के दो अन्य लक्षण भी हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं।

  1. वेदों और वैदिक कर्मकांडों तथा बलि के प्रति वितृष्णा प्रकट की गई हैः

2.42-44. हे पार्थ, जो लोग भोग विलास में लिप्त हैं और जिनकी बुद्धि को अविवेकी जनों की अलंकारमयी वाणी ने हर लिया है, जिनकी बड़ी-बड़ी इच्छाएं हैं और जो लोग स्वर्ग को अपना चरम लक्ष्य समझते हैं, जो लोग वेदों की चित्ताकर्षक शब्दावली से प्रसन्न होते हैं और यह कहते हैं कि इसके बाद कुछ नहीं है, उन्हें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। उनकी अलंकारमयी वाणी योग और ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के विशिष्ट कर्मकांडों के वर्णन से भरीपूरी रहती है, उनके शब्द (नए) जन्मों के कारण रूप होते हैं, ठीक उनके कर्मों के परिणाम की तरह (जो सकाम किए जाते हैं)।

2.45. वेदों में तीन गुणों का वर्णन है, हे अर्जुन, तू अपने को इन तीनों से मुक्त कर सदा संतुलित रह, प्राप्ति और ग्रहण (के विचारों) से मुक्त हो और आत्मस्थित रह।

2.46. ऐसे ब्राह्मण के लिए, जिसने आत्मा को जान लिया है, उसे सभी वेदों से