138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस क्षेत्र में जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, उसकी शुरुआत पुष्यमित्र द्वारा अश्वमेघ यज्ञ
करने से हुई। इस प्रकार के यज्ञ-कर्म बाद में पांच शताब्दियों, समुद्रगुप्त और उसके
उत्तराधिकारियों के समय तक जोर-शोर से प्रचलित रहे।य्
एक और प्रमाण यह है कि पुष्यमित्र ने अपने राज्यारोहण के बाद बौद्धों और बौद्ध धर्म के विरुद्ध जोर-शोर से और कटुतापूर्वक उन्हें सताने का आंदोलन छेड़ दिया था।
पुष्यमित्र ने बौद्ध धर्म को किस निर्दयता से कुचला, इसका अनुमान उसकी उस घोषणा से लगाया जा सकता है, जो उसने बौद्ध भिक्षुओं के विरुद्ध जारी की थी। इस घोषणा में पुष्यमित्र ने हर बौद्ध भिक्षु के कटे हुए सिर की कीमत सौ स्वर्ण मुद्राएं निर्धारित की थी। ख्1,
पुष्यमित्र के शासन में बौद्धों पर किस प्रकार अत्याचार किया गया, इस बारे में टिप्पणी करते हुए डॉ. हरप्रसाद शास्त्री कहते हैं ख्2, ः
फ्कट्टठ्ठर और धर्मांध सुघ् के शासन-काल में बौद्धों की स्थिति का अनुमान करना, उसका वर्णन करने की अपेक्षा अधिक सरल होगा। चीनी अधिकारियों से यह पता चलता है कि बहुत से बौद्ध आज भी पुष्यमित्र का नाम उसे भला-बुरा कहे बिना नहीं लेते हैं।य्
II
यदि पुष्यमित्र की क्रांति केवल राजनीतिक क्रांति थी, तब बौद्धों पर व्यापक रूप से अत्याचार करना उसके लिए कोई जरूरी नहीं था। यह तो लगभग वैसा ही कार्य था, जैसा गजनी के मोहम्मद ने हिंदू धर्म के साथ किया था। यह एक परिस्थितिजन्य साक्ष्य है, जिससे यह सिद्ध होता है कि पुष्यमित्र का उद्देश्य बौद्ध धर्म को समाप्त करना और उसके स्थान पर ब्राह्मणवाद की स्थापना करना था।
एक अन्य साक्ष्य द्वारा यह पता चलता है कि मौर्य लोगों के विरुद्ध पुष्यमित्र ने जिस क्रांति का सूत्रपात किया, उसका उद्देश्य बौद्ध धर्म का विनाश और उसके स्थान पर ब्राह्मणवाद की स्थापना करना था, जो कि विधि-संहिता के रूप में मनुस्मृति को अपनाए जाने के बारे में की गई घोषणा से स्पष्ट है।
मनुस्मृति को ईश्वरीय कृति कहा जाता है। यह कहा जाता है कि इसे स्वयंभू (अर्थात् ब्रह्मा) ने मनु को सुनाया था और बाद में मनु ने इसे मनुष्यों को बताया। यह दावा स्वयं
- बर्नोफ ल ‘इंट्रोडक्शन अल हिस्टरी’ ऑन बुद्धिज्म, इंडियन, (दूसरा संस्करण), पृ. 388
- बुद्धिस्टिक स्टडीज (सं. लॉ), अध्याय 34, पृ. 820, में श्री हरप्रसाद शास्त्री का लेख देखें।