ब्राह्मणवाद की विजय
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स्मृति में किया गया है। यह आश्चर्यजनक बात है कि किसी ने भी इस दावे के आधारों की जांच करने की चिंता नहीं की। इसका फल यह हुआ कि भारत के इतिहास में मनुस्मृति की विशेषता, स्थान और महत्त्व का मूल्यांकन करने में कोई भी सफल नहीं हो सका है। हालांकि हिंदू समाज एक बहुत बड़ी सामाजिक क्रांति से होकर गुजरा था और मनुस्मृति इसका अभिलेख है, तो भी यह बात भारत के इतिहासकारों पर भी लागू होती है। लेकिन यह भी सत्य है कि मनुस्मृति ने अपने कृतिकार के विषय में जो दावा किया है, वह बिल्कुल झूठा है और इस झूठे दावे के कारण जो आस्थाएं उपजी हैं, वह कोई तर्कसंगत नहीं हैं।
प्राचीन भारतीय इतिहास में मनु की आदरसूचक संज्ञा थी। इस संहिता को गौरव प्रदान करने के उद्देश्य से मनु को इसका रचयिता कह दिया गया। इसमें कोई शक नहीं कि यह लोगों को धोखे में रखने के लिए किया गया। जैसी कि प्राचीन प्रथा थी, इस संहिता को भृगु के वंश नाम से जोड़ दिया गया। ख्1, भृगु की इस कृति का वास्तविक नाम मनु की धर्म-संहिता है। भृगु का नाम इस संहिता के प्रत्येक अध्याय के अंत में जोड़ दिया गया है। इसमें हमें इस संहिता के लेखक के परिवार के नाम की जानकारी मिलती है। लेखक का व्यक्तिगत नाम इस पुस्तक में नहीं बताया गया है, जबकि कई लोगों को इसका ज्ञान था। लगभग चौथी शताब्दी में नारदस्मृति के लेखक को मनुस्मृति के लेखक का नाम ज्ञात था। नारद के अनुसार सुमति भार्गव नाम के एक व्यक्ति थे जिन्होंने मनु संहिता की रचना की। सुमति भार्गव कोई काल्पनिक नाम नहीं है। अवश्य ही यह कोई ऐतिहासिक व्यक्ति रहा होगा। इसका कारण यह है कि मनुस्मृति के महान टीकाकार मेधातिथे ख्2, का यह मत था कि यह मनु निश्चय ही कोई ‘व्यक्ति’ था। इस प्रकार मनु नाम सुमति भार्गव का छद्म नाम था और वह ही इसके वास्तविक रचयिता थे।
सुमति भार्गव ने इस संहिता की रचना कब की? यह संभव नहीं है कि इसकी रचना की सही तिथि बताई जाए। परंतु वह सही अवधि दी जा सकती है, जिसमें इस ग्रंथ की रचना की गई। कुछ ऐसे विद्वानों के अनुसार, जिनकी विद्वता पर संदेह नहीं किया जा सकता, सुमति भार्गव ने इस संहिता की रचना ईसा पूर्व 170 और ईसा पूर्व 150 के मध्य-काल में की और इसका नाम जान-बूझकर मनुस्मृति रखा। अब यदि हम इस तथ्य पर ध्यान दें कि पुष्यमित्र ने ब्राह्मणवाद की क्रांति ईसा पूर्व 185 में प्रारंभ की थी, तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि पुष्यमित्र ने मनुस्मृति नामक जिस संहिता को लागू किया, वह मौर्यों के बौद्ध राज्य के विरुद्ध ब्राह्मणवाद की क्रांति के सिद्धांतों का मूर्त रूप थी और यह कि मनुस्मृति ब्राह्मणवाद की अनेक संस्थाओं की उत्स थी।
- इस बात के लिए जायसवाल की पुस्तक हिंदू पोलिटी में मनु और याज्ञवल्क्य विषयक अध्याय देखें।
- कमेंट्री ऑन मनु, 1.1