ब्राह्मणवाद की विजय
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4.30. वह (गृहस्थ) वचन से भी विधर्मी तार्किक (जो वेद के विरुद्ध तर्क करे)
को सम्मान न दे।
12.95. वे सभी परंपराएं और वे सभी दर्शन की हेय पद्धतियां, जो वेद पर आधारित
नहीं हैं, मृत्यु के बाद कोई फल नहीं देतीं क्योंकि उनके बारे में यह घोषित है कि
वे अंधकार पर आधारित हैं।
12.96. वे सभी (सिद्धांत) जो (वेद) से विमुख हैं, उत्पन्न होते और (शीघ्र ही)
मिट जाते हैं, वे व्यर्थ हैं और झूठे हैं क्योंकि वे अर्वाव्Q (अर्थात् इस समय के
रचे हुए) हैं।
वे कौन से विधर्मी हैं जिनके बारे में मनु ने संकेत किया है और वे नए राजा से किसे चाहते हैं कि वह उन्हें अपने साम्राज्य से निष्कासित कर दे और वह कौन-सा गृहस्वामी है, जिसके लिए उसके जीवन-काल में और मृत्यु के बाद आदर देने की बात नहीं उठती? आधुनिक युग का यह व्यर्थ का दर्शन क्या है जो वेदों से भिन्न है और अज्ञान पर आधारित है तथा जिसका निश्चय ही विनाश हो जाएगा? इसमें कोई संदेह नहीं कि मनु के शब्दों में विधर्मी बौद्ध धर्मावलंबी है, और वेदों से भिन्न आधुनिक युग का दर्शन जिसे निस्सार कहा गया है, बौद्ध धर्म है। मनुस्मृति के एक अन्य टीकाकार कुल्लुक भट्टठ्ठ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मनु के इन श्लोकों में विधर्मियों से तात्पर्य बौद्ध धर्मावलंबियों और बौद्ध धर्म से है।
तीसरा साक्ष्य वह स्थान है जो मनुस्मृति के लिए निर्धारित किया गया है। मनुस्मृति के निम्नलिखित श्लोकों पर ध्यान दीजिएः
1.93. ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण, ज्येष्ठ होने से, वेद के धारण करने
से धर्मानुसार ब्राह्मण ही संपूर्ण सृष्टि का स्वामी होता है।
1.96. समस्त सृजन में प्राणधारी जीव श्रेष्ठ हैं, प्राणियों में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ हैं,
बुद्धिजीवियों में मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं।
1.100. पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह सब ब्राह्मणों का है, अर्थात् ब्राह्मण अच्छे
कुल में जन्म लेने के कारण इन सभी वस्तुओं का स्वामी है।
1.101. ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है, अपना ही दान करता है
तथा दूसरे व्यक्ति की कृपा से इन सबका भोग करते हैं।
10.3. जाति की विशिष्टता से, उत्पत्ति-स्थान की श्रेष्ठता से, अध्ययन एवं व्याख्यान
आदि द्वारा नियम के धारण करने से और यज्ञोपवीत-संस्कार आदि की श्रेष्ठता से
ब्राह्मण ही सब वर्णों का स्वामी है।