142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
11.35. ब्राह्मण के बारे में यह घोषित है कि वह विश्व का सृजक, दंडदाता,
अध्यापक है और इसलिए सभी सृजित मानवों का उपकारक है, कोई भी व्यक्ति
जो अहितकारी नहीं कह सकता और न उसके विरुद्ध कठोर शब्दों का प्रयोग
कर सकता है।
मनु आगे दिए गए शब्दों के द्वारा ब्राह्मणों को असंतुष्ट करने के विरोध में राजा को यह चेतावनी देता हैः
9.313. (राजा) को घोरतम विपत्ति में भी ब्राह्मणों को कु्रद्ध होने के लिए उत्तेजित
नहीं करना चाहिए क्योंकि ब्राह्मण क्रोधित होने पर उस राजा को, उसकी सेना,
हाथियों, घोड़ों, वाहनों को नष्ट कर सकते हैं।
मनु ने इससे आगे भी घोषणा की हैः
11.31. नियमों को अच्छी तरह जानने वाले ब्राह्मण को किसी दुःखदायी आघात
की स्थिति में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह अपनी
शक्ति द्वारा ही उस व्यक्ति को दंड दे सकता है जो उसे आघात पहुंचाता है।
11.32. उसकी निजी शक्ति जो केवल उसी पर निर्भर करती है, राजकीय शक्ति
से प्रबल होती है जो दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर है। अतः ब्राह्मण अपनी शक्ति से
ही अपने शत्रुओं का दमन कर सकता है।
ब्राह्मणों को देवता स्वरूप समझना और उन्हें राजा से ऊंचा स्थान देना तब तक संभव नहीं होगा जब तक राजा स्वयं ब्राह्मण न हो और मनु द्वारा व्यक्त विचारों से सहानुभूति न रखता हो। पुष्यमित्र और उसके उत्तराधिकारियों ने ब्राह्मणों के इन अतिशयोक्तिपूर्ण दावों को सहन नहीं किया होगा, जब तक कि वे स्वयं ब्राह्मण न रहे होंगे और ब्राह्मणवाद की स्थापना में रुचि न रखते होंगे। वास्तव में यह अधिक संभव है कि मनुस्मृति पुष्यमित्र के ही आदेश पर रची गई थी। यह ग्रंथ ब्राह्मणवाद का दर्शन-ग्रंथ है।
इन सभी तथ्यों पर ध्यान देने के बाद अब कोई संदेह नहीं रहता कि पुष्यमित्र की क्रांति का एकमात्र उद्देश्य बौद्ध धर्म का विनाश करना तथा ब्राह्मणवाद की पुनः स्थापना करना था।
भारत का इतिहास जिस रीति से लिखा गया है, उससे मैं अगर संतुष्ट होता, तब इस अध्याय के लिए भारत के इतिहास के बारे में मेरी उपर्युक्त टिप्पणी की कोई आवश्यकता नहीं थी। सच तो यह है कि मैं बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं। इसकी वजह यह है कि मुसलमानों के हमलों और इन हमलों में उनकी जीत पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया है। पन्ने-पर-पन्ने यह दिखाने के लिए लिखे गए हैं कि किस तरह एक के बाद एक मुसलमानों के हमले