7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 159

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

व मथा, और यह भी कुछ देर तक किया। उसके बाद वह थक गए और बाहर निकल आए, जिससे जलाशय फिर शांत हो गया। अगर हम हिंदू धर्म के सिद्धांतों को प्रतीक के लिए बालक मान लें तो कहा जा सकता है कि उन्होंने कभी भी जलाशय से बालक को बाहर निकाल कर नहीं फेंका। लेकिन बौद्ध धर्म के विरुद्ध संघर्ष में ब्राह्मणवाद ने तो सब कुछ ही बदल दिया। उन्होंने जलाशय से बौद्ध धर्म रूपी बालक और सारे जल को बाहर निकाल फेंका और उसकी जगह अपना जल भर दिया और वहां अपना बालक ले आए। ब्राह्मणवाद यह देखने के लिए नहीं रुका कि स्वच्छ और सुगंधियुक्त जल की तुलना में जो बौद्ध धर्म के पावन स्रोत से निःसृत हो रहा था, उसका जल कितना मटमैला और गंदा है। ब्राह्मणवाद इस बात पर विचार करने के लिए नहीं रुका कि बौद्ध शिशु की तुलना में उसका अपना शिशु कितना विकृत और कुरूप है। ब्राह्मणवाद ने अपने आक्रमणों के द्वारा बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने के लिए राजनैतिक शक्ति प्राप्त की और उसने बौद्ध धर्म को समूल नष्ट भी किया। इस्लाम ने हिंदू धर्म को नष्ट कर उसके स्थान पर अपने को स्थापित नहीं किया। इस्लाम ने अपने उद्देश्य को कभी भी व्यापक नहीं होने दिया। ब्राह्मणवाद ने यह कार्य किया। इसने बौद्ध धर्म को धर्म के रूप में निकाल बाहर किया और स्वयं उसका स्थान ले लिया।

इन तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि हिंदू भारत पर मुसलमान आक्रमणों के कारण जितना भी प्रभाव उत्पन्न हो सकता था, उसकी तुलना में बौद्ध भारत पर ब्राह्मण आक्रमणों का प्रभाव भारत के इतिहासकारों के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन इतिहासकारों ने उन दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तनों पर बहुत कम ध्यान दिया है, जो मौर्यों द्वारा निर्मित बौद्ध भारत को झेलने पड़े और यदि कहीं कुछ वर्णन हुआ भी तो वहां ऐसे प्रश्नों का सटीक विवेचन करने पर ध्यान नहीं दिया गया जो सहज ही उत्पन्न होते हैं, जैसे शुंग, कण्व और आंध्र कौन थे, उन्होंने बौद्ध भारत को नष्ट क्यों किया जिसका निर्माण मौर्यों ने किया था। इस तरह उन परिवर्तनों का विवेचन करने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया, जो ब्राह्मणवाद ने बौद्ध धर्म पर विजय पाने के बाद राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था में किए थे।

भारत के इतिहास के इस पहलू को न समझने का कारण कुछ बहुत ही गलत धारणाएं हैं जो काफी प्रचलित हैं। यह आमतौर पर मान लिया गया है कि भारत की एक ही संस्कृति रही है और सारे इतिहास में यही मिलती है, ब्राह्मणवाद, बौद्ध धर्म और जैन धर्म इसके विभिन्न पहलू हैं और इनमें परस्पर कोई मूल विरोध नहीं रहा है। दूसरी धारणा यह कि भारतीय राजनीति में जो भी झगड़े व लड़ाइयां देखने के लिए मिलती हैं, उनका आधार केवल राजनीति और वंशगत बैर आदि रहा है, और इनका कोई भी सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व नहीं रहा। इन्हीं गलत धारणाओं के कारण भारत का इतिहास जड़वत हो गया और एक वंश का अभिलेख मात्र बनकर रह गया। इस प्रवृत्ति या इस प्रकार इतिहास लिखने के तरीकों में तभी सुधार आ सकता है, जब इन दो तथ्यों को