7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 160

ब्राह्मणवाद की विजय

स्वीकार कर लें जिनके बारे में कोई विवाद नहीं है।

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सबसे पहली बात तो यह स्वीकार कर लेनी चाहिए कि एक-समान भारतीय संस्कृति जैसी कोई चीज कभी नहीं रही और यह कि भारत तीन प्रकार का रहा - ब्राह्मण भारत, बौद्ध भारत और हिंदू भारत। इनकी अपनी-अपनी संस्कृतियां रहीं। दूसरी बात यह स्वीकार की जानी चाहिए कि मुसलमानों के आक्रमण के पहले भारत का इतिहास ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के बीच परस्पर संघर्ष का इतिहास रहा है। जो कोई इन दो तथ्यों को स्वीकार नहीं करता, वह भारत का सच्चा इतिहास कभी नहीं लिख सकता, ऐसा इतिहास जो उस युग के अर्थ और उद्देश्य को स्पष्ट कर सके। भारत का इतिहास जिस प्रकार लिखा गया, उसे सुधारने और बीते युग का अर्थ और उद्देश्य स्पष्ट करने की भावना से प्रेरित होकर मैं बौद्ध भारत पर ब्राह्मण भारत के आक्रमण और बौद्ध धर्म पर ब्राह्मणवाद की राजनैतिक विजय का इतिहास फिर से लिख रहा हूं।

इसलिए हम इस तथ्य को स्वीकार कर अपनी बात शुरू करेंगे कि पुष्यमित्र की क्रांति राजनैतिक क्रांति थी, जिसकी योजना ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को निकाल बाहर करने के लिए तैयार की थी।

जिज्ञासु सहज ही यह पूछेगा कि ब्राह्मणवाद ने विजयी होने के बाद क्या किया? मैं अब इसी प्रश्न को लेता हूं। विजय के दर्प से फूले इस ब्राह्मणवाद के कृत्यों अथवा दुष्कृत्यों की सूची सात शीर्षकों में बनाई जा सकती है - (1) इसने ब्राह्मणों को शासन करने और राजहत्या करने का अधिकार प्रदान किया, (2) इसने ब्राह्मणों को विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों का वर्ग बनाया, (3) इसने वर्ण को जाति में बदल दिया, (4) इसने विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष और समाज-विरोधी भावना पैदा की, (5) इसने शूद्रों और स्त्रियों को हेय माना, और (6) इसने वर्ण-असमानता की प्रणाली को थोप दिया, और (7) इस सामाजिक व्यवस्था को कानूनी और कट्टठ्ठर बना दिया जो पहले पारंपरिक और परिवर्तनशील थी।

हम पहले शीर्षक से शुरू करते हैं।

पुष्यमित्र ने जिस क्रांति का सूत्रपात किया, उसने शुरू में ब्राह्मणों के लिए कठिनाई पैदा कर दी। लोग आसानी से इस क्रांति के साथ समझौता नहीं कर सके। जनता के विरोध को बाण ख्1, कवि ने बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया है। वह इस क्रांति का उल्लेख करते हुए पुष्यमित्र की, उसे अधम जाति में पैदा हुआ बताकर, आलोचना करता है और उसके द्वारा की गई राजहत्या को अनार्य, अर्थात् आर्य नियम के विरुद्ध बताता है। पुष्यमित्र की क्रांति के आरम्भ होने तक तीन बातों पर आर्य नियम पूर्ण रूप से स्पष्ट थे। तत्कालीन आर्य

  1. हर्ष चरित, स्मिथ (1924) द्वारा उद्धृत, पृ. 208