7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 161

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नियमों में इस बात का स्पष्ट विधान था कि (1) राजा होने का अधिकार केवल क्षत्रिय का है, कोई ब्राह्मण राजा नहीं हो सकता, (2) कोई भी ब्राह्मण आयुधों का व्यवसाय नहीं करेगा ख्1,, और (3) राजा के विरुद्ध विद्रोह पाप है। पुष्यमित्र ने विद्रोह को संरक्षण देकर इन व्यवस्थाओं में प्रत्येक के विरुद्ध पाप किया है। वह ब्राह्मण था। उसने ब्राह्मण होते हुए राजा के विरुद्ध विद्रोह किया। उसने आयुधों का व्यवसाय अपनाया और वह राजा बन बैठा। सामान्य-जन उसके इस कार्य से असंतुष्ट था जो नियम-विरुद्ध था। ब्राह्मणों को पुष्यमित्र द्वारा उत्पन्न इस परिस्थिति को विनियमित करना पड़ा। ब्राह्मणों ने यह कार्य सारी व्यवस्था में परिवर्तन कर पूरा किया। व्यवस्था में यह परिवर्तन मनुस्मृति में बहुत ही स्पष्ट दिखाई देता है। मैं मनुस्मृति में से संबंधित श्लोकों को यहां उद्धृत कर रहा हूंः

12.100. राज्य में सेनापति का पद, शासन के अध्यक्ष का पद, प्रत्येक के ऊपर

शासन करने का अधिकार ब्राह्मण के योग्य है।

यहां हम नियम में एक परिवर्तन देखते हैं। नया नियम यह घोषित करता है कि ब्राह्मण को सेनापति बनने, किसी राज्य को जीतने, उस राज्य का शासक और उसका राजा बनने का अधिकार है।

11.31. नियमों को अच्छी तरह जानने वाले ब्राह्मण को किसी दुःखदायी आघात की

स्थिति में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह अपनी शक्ति

द्वारा ही उस व्यक्ति को दण्ड दे सकता है और उसे आघात पहुंचाता है।

11.32. उसकी निजी शक्ति जो केवल उसी पर निर्भर करती है, राजकीय शक्ति

से प्रबल होती है जो कि दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर है। अतः ब्राह्मण अपनी शक्ति

के द्वारा ही अपने शत्रुओं का दमन कर सकता है।

11.261-62. कोई भी ब्राह्मण जिसने चाहे तीनों लोकों के मनुष्यों की हत्याएं क्यों

न की हों, उपनिषदों के साथ-साथ ऋव्Q, यजु या सामवेद का तीन बार पाठ कर

सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

  1. यह नियम इतना कठोर था कि आपस्तम्ब धर्म सूत्र के अनुसार, ‘कोई भी ब्राह्मण अपने हाथों में आयुध

नहीं ग्रहण करेगा, चाहे वह उसकी जांच क्यों न करना चाहता हो।’ अतः पुष्यमित्र ने, जो कि ब्राह्मण

था, ऐसा कार्य किस प्रकार किया, यह आश्चर्य की बात है क्योंकि इन परिस्थितियों में यह कार्य वही

कर सकता था जो वीर जाति का हो। इसे हरप्रसाद शास्त्री ने बहुत अच्छी तरह स्पष्ट किया है। उनके

अनुसार, शुंग यद्यपि ब्राह्मण था, तथापि वह वीर जाति का था। युद्धशील ब्राह्मणों में दो ब्राह्मण शेष

ब्राह्मणों से पृथक थे, विश्वामित्र और भारद्वाज। विश्वामित्र की पत्नी बांझ होने से, एक भारद्वाज से

प्राचीन प्रथा ‘नियोग’ के अनुसार विश्वामित्र के लिए पुत्र पैदा करने के लिए कहा गया। इससे शुंग

पैदा हुआ। वह एक गोत्र का जनक बना। इस गोत्र ने सामवेद का अध्ययन करना शुरू किया। शुंग का

गोत्र द्वैमुश्य गोत्र कहा गया, अर्थात् दो गोत्रों, विश्वामित्र और भारद्वाज, दोनों ने युद्ध को अपना व्यवसाय

चुना। - देखें, बुद्धिस्टिक स्टडीज (सं. लॉ.), अध्याय 34, पृ. 820.