7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 162

ब्राह्मणवाद की विजय

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यहां नियम में दूसरा परिवर्तन किया गया है। यह ब्राह्मण को न केवल राजा की हत्या, बल्कि जन-सामान्य में नर-संहार करने का भी अधिकार देता है, बशर्ते वह उसकी शक्ति और पद को क्षति पहुंचाते हों।

8.348. यदि किसी द्विज के कर्तव्य को बलपूर्वक किया जाता है या उन पर विपत्ति

आती है या उनके दुर्दिन आते हैं तो वे शस्त्र उठा सकते हैं।

9.320. यदि कोई क्षत्रिय ब्राह्मण के विरुद्ध सभी अवसरों पर हिंसक ढंग से शस्त्र

उठाता है, तो उसे स्वयं वह ब्राह्मण ही दंड देगा क्योंकि क्षत्रिय मूलतः ब्राह्मण से

ही पैदा हुआ है।

यह तीसरा वैधानिक परिवर्तन है। यह विद्रोह करने और राजहत्या करने के अधिकार को मान्यता देता है। यह नया नियम बड़ी ही कुशलतापूर्वक बनाया गया है। यह विद्रोह करने का अधिकार तीन उच्च वर्गों को देता है। लेकिन यह अधिकार ब्राह्मणों को दिया गया और इसके लिए ऐसी परिस्थिति की व्यवस्था की गई, जिसके रहते विद्रोह में क्षत्रिय और वैश्य, ब्राह्मण का सहभागी न बन सकें। विद्रोह करने के अधिकार को भली प्रकार परिसीमित किया गया। इस अधिकार का प्रयोग केवल ऐसी दशा में होगा, जब राजा विभिन्न वर्णों के लिए मनु द्वारा निर्दिष्ट व्यवसायों में उलट-फेर करने का दोषी हो।

यह नियम-परिवर्तन जितने आवश्यक थे, उतने ही क्रांतिकारी। इनका उद्देश्य उस स्थिति को अधिनियमित और नियमित करना था जो पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य राजा की हत्या कर उत्पन्न की थी। इन विधिक परिवर्तनों के होने से कोई भी ब्राह्मण राजा बन सकता था, आयुध ग्रहण कर सकता था, किसी भी राजा को राजगद्दी से उतार या उसकी हत्या कर सकता था, जो चातुर्वर्ण्य का विरोधी हो और किसी भी व्यक्ति की हत्या कर सकता था, जो ब्राह्मण की सत्ता का विरोध करता हो। मनु ने ब्राह्मणों को नर-संहार का अधिकार दे दिया, बशर्ते यह उनके हितों की रक्षा करने के लिए आवश्यक हो जाए।

इस प्रकार ब्राह्मणवाद ने शासन करने के ब्राह्मण के अधिकार को सुस्थापित कर दिया और इस संबंध में जो भी शंकाएं और विवाद थे, उन सबको दूर कर दिया। लेकिन यह समूचे ब्राह्मण वर्ग के लिए कोई लाभ की बात न थी। यदि ब्राह्मण-शासन में किसी ब्राह्मण के साथ गैर-ब्राह्मणों की तरह सामान्य-जन जैसा व्यवहार किया जाए और उसको उन जैसे अधिकार और कर्त्तव्य प्राप्त हों, तब कोई खास अंतर नहीं कहा जा सकता था। यदि ब्राह्मण-शासन को अपने अस्तित्व के बारे में कोई औचित्य सिद्ध करना था, तब उसे ब्राह्मणों के समस्त वर्ग को विशेषाधिकार और विशेष रियायत देनी चाहिए थी। यदि पुष्यमित्र की क्रांति में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता स्वीकार न की गई होती और उन्हें विशेष सुविधाएं न प्रदान की गई होतीं, तब निश्चय ही वह असफल हो जाती। मनु इससे पूरी