ब्राह्मणवाद की विजय
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वैश्यों के लिए निर्दिष्ट हैं। लेकिन उदारता, वेदों का अध्ययन और यज्ञ-कर्म करना
उनके कर्त्तव्य हैं।
यहां तीन कार्य ऐसे हैं, जिन पर मनु ने ब्राह्मणों का एकाधिकार निश्चित किया हैः ये कार्य हैं, वेदों का अध्ययन, यज्ञ-कर्म और दान लेना।
ब्राह्मणों को जो छूट दी गई, वह निम्नलिखित है। इसकी कोटियां हैं - कर से मुक्ति और अपराध करने पर अपराधी को दिए जाने वाले दंड के कुछ रूप।
7.133. चाहे कोई राजा (अपूर्ण इच्छा ग्रस्त होकर) मर भी क्यों न रहा हो, तब
भी उसे श्रोत्रियों पर कोई कर नहीं लगाना चाहिए और उसके राज्य में रह रहे
किस भी श्रोत्रिय की भूख से मृत्यु नहीं होनी चाहिए।
8.122. वे घोषित करते हैं कि विज्ञों ने ये आर्थिक दंड मिथ्या साक्ष्य देने वालों
के लिए निर्धारित किए हैं, जिससे न्याय-व्यवस्था असफल न हो और जिससे
अन्याय को रोका जा सके।
8.123. लेकिन न्यायप्रिय राजा तीन निचली जातियों (वर्णों) के व्यक्तियों को
आर्थिक दंड देगा और उन्हें निष्कासित कर देगा, जिन्होंने मिथ्या साक्ष्य दिया है,
लेकिन ब्राह्मण को वह केवल निष्कासित करेगा।
8.124. स्वयंभू के पुत्र मनु ने ऐसे दस स्थान बताए हैं जहां निचली तीन जातियों
के वर्णों के मामले में दंड दिया जा सकता है। लेकिन ब्राह्मण (उस देश से)
अक्षत निर्वासित हो जाएगा।
8.379. ब्राह्मण के लिए मृत्यु-दंड के स्थान पर उसका सिर मुंडा देना निश्चित
किया गया है, लेकिन अन्य जातियों (के लोगों) को मृत्यु-दंड भुगतना होगा।
8.380. वह किसी भी ब्राह्मण की कभी भी हत्या न करे, चाहे उस ब्राह्मण ने
कितने भी अपराध किए हों, उसे ऐसे अपराधी को देश से अपनी संपत्ति सहित
और सकुशल चले जाने देना चाहिए।
इस प्रकार मनु ब्राह्मण को गंभीरतम अपराधों के लिए निर्धारित सामान्य दंड-विधान से ऊपर रखता है। मृत्यु-दंड के लिए उसके अपराधों के सिद्ध होने पर भी उसे सकुशल और अपनी संपत्ति सहित देश से निकल जाने की स्वीकृति देता है। उसे आर्थिक दंड या मृत्यु-दंड से बरी रखता है। उसे केवल देश निष्कासन का दंड भोगने देता है। जघन्यतम अपराध करने पर इस स्थिति को होब्स ने केवल ‘वातावरण में परिवर्तन’ की संज्ञा दी है।
मनु ने ब्राह्मण को कुछ विशेषाधिकार दिए हैं। न्यायाधीश ब्राह्मण होना चाहिएः
8.9. परंतु यदि राजा अभियोगों की जांच स्वयं नहीं करता, तब उसे इन अभियोगों